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रविवार, 24 फ़रवरी 2013

सोये एहसास जगाओ तो कोई बात बने.....

 ग़ज़ल
Gabbiani al tramonto
सोये एहसास जगाओ तो कोई बात बने.....

-अरुण मिश्र.

सोये  एहसास  जगाओ,  तो  कोई बात बने। 
दर्द का  गीत  जो गाओ,  तो  कोई बात बने।।
  
सुब्ह  ख़ामोश  है,  पसरा  हुआ  सन्नाटा है। 
इक  कोई  टेर  लगाओ,  तो  कोई बात बने।।
  
दावा-ए-जादू-बयानी  पे  वो  हॅस कर, बोले। 
आग  पानी में  लगाओ,  तो  कोई बात बने।।
  
हम कहाँ चूके,जगी आग तो हमने भी कहा।  
आग से  आग बुझाओ,  तो  कोई बात  बने।।
  
इब्ने-आदम हैं ‘अरुन’ , राहे-गुनह के राही। 
आप भी  साथ जो आओ  तो कोई बात बने।। 
                                          *

 

बुधवार, 4 जुलाई 2012


ग़ज़ल 

आ जाये कभी चैन-ओ-आराम तो कहना....   

-अरुण मिश्र. 


छोड़ा जो  अधूरा हो  कोई काम  तो कहना।
औ' इसका कभी माँगा हो इन'आम, तो कहना।।

कुछ दिन को मुझे, घर में ज़रा रख के तो देखो।
मैं  घर  का  बदल  दूँ  न  तेरे  नाम,  तो  कहना।।

ग़ुल   आँखों  ही  आँखों   में   करें ,  ढेरों   इशारे।
मारे  न   गए   सैकड़ों   गुलफ़ाम ,  तो   कहना।।

कुछ ग़ुल ने कान में कहा,  बुलबुल  चहक उठी।
गुलशन में  न हो जाये  राज़  आम,  तो  कहना।।

दे कर  दवा-ये-दर्दे-दिल,  हँस कर कहे,  'अरुन'।
आ  जाये  कभी  चैन - ओ - आराम,  तो कहना।।
                                        *
    


रविवार, 29 अप्रैल 2012

एहसासे-बुलंदी से तो नाहक़ घिरे हैं लोग........

ग़ज़ल

-अरुण मिश्र.

एहसासे-बुलंदी  से  तो  नाहक़  घिरे हैं  लोग। 
इन्सानियत की हद से भी नीचे गिरे हैं लोग॥


लड़ते   जो   अक़ीदों  पे,  कोई  और  बात थी। 
लड़ते हैं ज़ुबानों  पे, अज़ब  सिरफिरे  हैं लोग॥
  
उलझे हों कि सुलझे हों, पै उम्मीद  इन्हीं  से। 
अल्लाह की पहेली के , खुलते सिरे   हैं  लोग॥
  
दैरो - हरम   में   ढूढ़ते,  शम्में   जला - जला। 
वो  नूर , बख़ुद  जिसमें  सरो-पा घिरे हैं लोग॥
  
सब  वक़्त की  है बात, ये शाहो-गदा के  खेल। 
जो आज तेरे साथ  'अरुन'  सब  मिरे हैं लोग॥
                                  *

रविवार, 22 अप्रैल 2012

यारब! ज़रूर कीजियो वाइज़ का बेड़ा ग़र्क.........

ग़ज़ल 

-अरुण मिश्र. 


ऐशे-बहिश्त   के   लिये , लुत्फ़े- ज़माना   तर्क। 
या रब!  ज़रूर कीजियो , वाइज़  का  बेड़ा  ग़र्क॥ 


उनकी  तो  उम्र ढल गई,  अब  रब से  लौ लगी। 
हम तो  अभी जवान हैं , हमको   पड़े  है   फ़र्क॥ 


रस  हो,  न रंग हो,  न  राग,  मौज ,  न  मस्ती। 
हंगामा हुस्नो-इश्क़  का, न  हो  तो  ज़मीं  नर्क॥ 


ऋषियों की  हैं  सन्तान , न  साक़ी  निगाह फेर। 
जीते थे  सौ बरस कि ,  जो  पीते थे  सोम-अर्क़॥ 


पर्दा  बहुत  'अरुन'  था, पै' जो  अपनी  पे  आये। 
आख़िर   को  कोहे-तूर पे,चमकी ही आ के बर्क॥
                                  *

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

फ़ित्नासामां हैं साँवली आँखें............












फ़ित्नासामां हैं 
साँवली आँखें............



ग़ज़ल  


-अरुण मिश्र.

देखिये    तो    लगें    भली   आँखें। 
फ़ित्नासामां    हैं    साँवली    आँखें॥

देखती  भी   हैं,   देखती  भी   नहीं। 
बावला   कर   दें,   बावली   आँखें॥

क्यूँ  मचायें न दिल में वो हलचल। 
कितनी  चंचल हैं,  मनचली आँखें॥

वो जगा तो 'अरुन'  की  नींद  उड़ी। 
ली  जो  अँगड़ाई,   हैं  मली  आँखें॥
                       *