शनिवार, 11 सितंबर 2010

ईद मुबारक़ पर विशेष



चॉंद ईद का देखे


-अरुण मिश्र


चॉंद चौदहवीं का भी, चॉंद ईद का देखे।
‘अरुन’ की नज़रों ने भी, क्या-क्या नज़ारे देखे।।

जैसे दरिया की कशिश, ऑखों में समन्दर के।
कहकशॉं जैसे, कोई नन्हा सितारा देखे।।

जो थी हसरत, वो मसर्रत हो,
सुकूं में बदली।
मैंने उन नयनों में, पल-पल नये जादू देखे।।

गोरी को पिउ की झलक,
इंतिज़ार के लम्हे।
याद आवें बहुत, छत पर खड़ी, एक-टक देखे।।

दुआयें अपनी, आसमानों को हो जायें
क़बूल
बहन ने भाई, मॉं ने बच्चों के मुखड़े देखे।।

क़र्ज़ ने स्वाद सिवइयों का कसैला है किया।
चॉंद को देखे , या ठंढा पड़ा चूल्हा देखे।।

सिर्फ देखो नहीं , इस दर्द को महसूस करो।
तंगी हर हाल में, उम्मीद का पहलू देखे।।


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रविवार, 5 सितंबर 2010

शिक्षक दिवस पर...

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को शतशः नमन ...

गुरु - गरिमा के सर्वोच्च शिखर


-अरुण मिश्र

तुम अध्यापक , तुम अध्येता,

तुम राजनयिक, शास्त्रज्ञ महा

शिक्षा - संस्कृति के अग्रदूत ,

तुम को पा , दर्शन, धर्म लहा । ।



भारत माँ के गौरव ललाम ,
गुरु - गरिमा के सर्वोच्च शिखर

यह श्रद्धांजलि , स्वीकार करो ,

गाँधी - युग के ,अंतिम ऋषिवर । ।


बुधवार, 1 सितंबर 2010

जन्माष्टमी पर विशेष


क्या
ख़ूब साँवले! हो

- अरुण मिश्र


जब चाँदनी खिली हो, और चाँद सामने हो।
देखूँ तुम्हें , उसको , क्या ख़ूब साँवले! हो।।

भादों की बदलियाँ थीं, थी रैन भी अँधेरी।
आँगन में अचानक, तुम चाँद सा खिले हो।।

चितचोर हो, छलिया हो,फिर भी यकीं तुम्हीं पे।
ब्रज की दही से मीठे, तुम दूध के धुले हो।।

तुम राम हो,कान्हा हो,इस मिट्टी की ख़ुशबू हो।
हर साँस में रवां हो, अहसास में घुले हो।।

तुझ साँवरे सा उजला, देखा अरुनहमने।
गो-रस में छलकते हो, मक्खन में तुम सने हो।।


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रविवार, 29 अगस्त 2010

जन्माष्टमी पर विशेष

मुक्तक




- अरुण मिश्र


मोहन है , कन्हैया है , नटवर है , श्याम है
हो कर भी परम तत्व, वह हम सब सा आम है
वंशी है उस की, सृष्टि के नव-चेतना का स्वर ;
राधा, जगत में नेह की लीला का नाम है ।।


***

अपने तमाम ऐबों के संग , है वो छबीला।
है काला-कलूटा , मगर है फिर भी रंगीला।
वह 'व्यक्ति में भगवान की है कल्पना सुंदर';
यह कल्पना भी है , उसी भगवान की लीला।।

रविवार, 22 अगस्त 2010

रक्षाबंधन पर विशेष


रक्षा-सूत्र


-अरुण मिश्र

बहन, मेरी कलाई पर,
जो तुमने तार बॉधा है।
तो, इसके साथ स्मृतियों-
का, इक संसार बॉधा है।।

ये धागे सूत के कच्चे।
ये कोमल, रेशमी लच्छे।
दिलाते याद उस घर की,
रहे जिस घर के हम बच्चे।।

इसे बॉधा, तो तुमने,
फिर वही परिवार, बॉधा है।।

बड़ी हो तो, असीसें औ’
दुआयें, बॉधी हैं इसमें।
जो छोटी हो तो, मंगल-
कामनायें बॉधी हैं इसमें ।।

सहज विश्वाश बॉधा है।
परस्पर प्यार बॉधा है।।

सुरक्षित हों सदा भाई।
सदा रक्षित रहे बहना।
ये रक्षा-सूत्र है, इस देश
के, संस्कार का गहना।।

महत् इस पर्व पर, तुमने
अतुल उपहार, बॉधा है।।


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सोमवार, 16 अगस्त 2010

तुलसी जयन्ती पर

चन्द कंवल तुलसी पे...


-अरुण मिश्र


कल्पना-तुलसी के दल, तुलसी पे।
भावना-गंगा का जल, तुलसी पे।।

शब्द-अक्षत के संग, समर्पित हैं।
छन्द के, चन्द कंवल, तुलसी पे।।

है ये श्रद्धा, ढली जो, ’शेरों में।
कौन कहता है ग़ज़ल, तुलसी पे।।

सादगी से कहो, जो बात कहो।
लीजिये इसकी नकल, तुलसी पे।।

ज्ञान, वैराग्य, भक्ति औ’ दर्शन।
किस पहेली का,न हल, तुलसी पे।।

बातें, जो हैं कठिन, किताबों में।
वो लगें, कितनी सहल, तुलसी पे।।

यूँ ही हुलसी नहीं थीं, माँ उनकी।
कौन हुलसे न, अमल तुलसी पे।।

राम तो, खुद ही, खिंचे आये हैं।
एक भौंरे से, कमल तुलसी पे।।

पैठिये आप ‘अरुन’, मानस में।
पाइये राम का बल, तुलसी पे।।