https://youtu.be/XDcPvMFmtE8
वातापि गणपतिं भजेऽहं
वारणाश्यं वरप्रदं श्री ।
वारणाश्यं वरप्रदं श्री ।
भूतादि संसेवित चरणं
भूत भौतिक प्रपंच भरणम् ।
वीतरागिणं विनुत योगिनं
विश्वकारणं विघ्नवारणम् ।
पुरा कुंभ संभव मुनिवर
प्रपूजितं त्रिकोण मध्यगतं
मुरारि प्रमुखाद्युपासितं
मूलाधार क्षेत्रस्थितम् ।
परादि चत्वारि वागात्मकं
प्रणव स्वरूप वक्रतुंडं
निरंतरं निखिल चंद्रखंडं
निजवामकर विद्रुतेक्षुखंडम् ।
करांबुज पाश बीजापूरं
कलुषविदूरं भूताकारं
हरादि गुरुगुह तोषित बिंबं
हंसध्वनि भूषित हेरंबम् ।
"वातापि गणपतिं भजेहं" कर्नाटक संगीत की सबसे लोकप्रिय और प्रसिद्ध स्तुतियों में से एक है।
इसे महान संगीतकार मुथुस्वामी दीक्षितर ने संस्कृत भाषा और हंसध्वनि राग में रचा था।
इस स्तुति में भगवान गणेश (वातापी गणपति) की स्तुति की जाती है।
गीत का मुख्य भाव और अर्थ :
'वातापी' उस स्थान का नाम है जहाँ के यह गणपति हैं (वर्तमान में कर्नाटक का बदामी)।
इस कीर्तन की शुरुआती पंक्तियाँ हैं :
वातापि गणपतिं भजेऽहं वारणाश्यं वरप्रदं श्री।
भूतादि संसेवित चरणं भूत भौतिक प्रपञ्च भरणं।
इसका अर्थ है: "मैं वातापी (बदामी) में स्थित भगवान गणपति की पूजा (भजन) करता हूँ, जो हाथी के मुख वाले (वारणाश्य) और वरदान देने वाले (वरप्रद) हैं। जिनके चरणों की सेवा भूत-प्रेत आदि करते हैं और जो सम्पूर्ण सृष्टि का पालन-पोषण करते हैं।
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