अपने चारों ओर देखो, जो बड़े सरनाम हैं। बेशतर इंसानियत के नाम पर दुश्नाम हैं।। ताक़तो-दौलत व शोहरत,जिसपे है जितनी यहॉ। उसपे उतनी तीरग़ी, उतने ही ओछे काम हैं।। ऐश , रुतबा है, अकड़ है, हेकड़ी है, ऐंठ है। फ़ख्र करने के लिये, उसपे कई इनआम् हैं।। दिल लिये, नेक़ी लिये, नीयत,शराफ़त को लिये। हम ‘अरुन’ इस दौर में, नाहक़ हुये बदनाम हैं।। *
सरापा-नाज़ से क्या पूछें, नाज़ुकी क्यों है। उठी निगाह है, लेकिन पलक झुकी क्यों है॥ तुम्हारी खामशी , किस्से बयान करती है। मैं जग रहा हूँ , मेरी नींद सो चुकी क्यों है॥ तुम्हारे बिन जो जिये, सोचते रहे अक्सर। रवां है साँस पर, लगती रुकी-रुकी क्यों है॥ बहुत सलीके से हमने तो दिल की बात कही। तुम्ही कहो भला, ये बात बेतुकी क्यों है॥ कहे था दिल, ये कहेंगे, वो कहेंगे तुझसे। पर 'अरुन' रूबरू,हिम्मत चुकी-चुकी क्यों है॥ *