मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

महालक्ष्मी अष्टकम् (क्रमशः ५ )













महालक्ष्मी अष्टकम्
का काव्य-भावानुवाद (क्रमशः ५ )


-अरुण मिश्र.


तुम आद्यन्त-रहित हो देवी,  आदिशक्ति हो महेश्वरी हो।
प्रकट  और सम्भूत  योग  से;   महालक्ष्मी तुम्हें नमन है।।५।।


                                                                *

मूल संस्कृत  :

                        इन्द्र उवाच

आद्यन्तरहिते देवि   आद्यशक्तिमहेश्वरि।
योगजे योगसम्भूते   महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥५ ॥
 
                                   *

सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

महालक्ष्मी अष्टकम् (क्रमशः ४)










महालक्ष्मी अष्टकम्
का काव्य-भावानुवाद (क्रमशः ४)


-अरुण मिश्र.


सिद्धि-बुद्धि सब देने वाली, भोग अरु मोक्ष प्रदायिनि! माता।
मन्त्र-पूत    हे    देवि     सर्वदा !    महालक्ष्मी  तुम्हें  नमन है।।४ ।।


                                                                  *

मूल संस्कृत  :

                        इन्द्र उवाच

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी।
मन्त्रपूते  सदा  देवि  महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥४॥  

                                   *

रविवार, 12 अक्टूबर 2014

अक्टूबर में आम्र-मंजरी

अक्टूबर में आम्र-मंजरी














अक्टूबर में आम्र-मंजरी

-अरुण  मिश्र 

पेड़  आम  का   मेरे लॉन  में,
यूँ  तो  आम    आम  जैसा है । 
पर  इस में  कुछ ख़ास बात है,
यह भी  मनमौजी  मुझ सा है ॥ 

वर्षा, ग्रीष्म, शरद सब में सम,
जब जी आये  फगुआ,  कजरी ।
नव-पल्लव  हैं  मध्य शरद में, 
अक्टूबर    में      आम्र-मंजरी ॥ 

                            *    




महालक्ष्मी अष्टकम् ( क्रमशः ३)











महालक्ष्मी अष्टकम्
का काव्य-भावानुवाद ( क्रमशः ३)

-अरुण मिश्र.


हे सर्वज्ञ !  सर्व-वरदे माँ !  सर्व  दुष्ट-जन को  भय  देतीं।
सर्व  दुःख   हर  लेतीं   देवी;    महालक्ष्मी तुम्हें नमन है।।३ ॥

                                      *

मूल संस्कृत  :

                        इन्द्र उवाच

सर्वज्ञे       सर्ववरदे        सर्वदुष्टभयङ्करि।
सर्वदुःखहरे   देवि    महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥३॥ 


                                   *

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

महालक्ष्मी अष्टकम् ( क्रमशः २)

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महालक्ष्मी अष्टकम्
का काव्य-भावानुवाद ( क्रमशः २ )

-अरुण मिश्र.

नमन तुम्हें  हे गरुड़ारूढ़ा !  कोलासुर के हेतु   भयङ्करि !
देवि !  समस्त पाप  हरती हो;  महालक्ष्मी तुम्हें नमन है।।२।।


                                      *

मूल संस्कृत  :

                        इन्द्र उवाच

नमस्ते  गरुडारूढे  कोलासुरभयङ्करि।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥२।।


                                   *
 

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

महालक्ष्मी अष्टकम्



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महालक्ष्मी अष्टकम्

"हंस मर रहे भूखे , उल्लुओं की  पौ बारह,
 लक्ष्मी मैया की भी सुरसती से क्या ठनी ॥"

                                         

                                           -अरुण मिश्र

शरद् पूर्णिमा बीत गयी है।
दीपावली का पक्ष प्रारम्भ हो गया है।
इस दीपावली में सरस्वती मइया की कृपा से,
इन्द्रकृत लक्ष्मी अष्टकम् (जो संभवतः पद्मपुराण में है)
का भावानुवाद करने को ठाना है।
लक्ष्मी मैया और सरस्वती मैया का बैर जग जाहिर है।
अब भगवान ही बेड़ा पार करें। (और ये दोनोँ देवियाँ भी
क्षमाशील एवं कृपालु होवें।)

काव्य-भावानुवाद (क्रमशः) :

तुम्हें प्रणाम  महामाया हे ! श्रीपीठ-स्थित, सुरगण-पूजित।
शंख, चक्र औ’ गदा लिये कर,   महालक्ष्मी   तुम्हें  नमन है।।१॥


मूल संस्कृत  :

                        इन्द्र उवाच

नमस्तेस्तु  महामाये   श्रीपीठे   सुरपूजिते।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥१॥


   

बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

आज शरद पूर्णिमा......

Shubh Sharad Purnima

आज शरद पूर्णिमा......

-अरुण मिश्र.

आज शरद पूर्णिमा
शरद का चाँद
आज अमृत बरसेगा ॥ 


प्रासादों  के  दीर्घ  अजिर में
महलों के विस्तीर्ण छतों पर ।
भर-भर  खीर   रखे  जायेंगे
रजत  कटोरे  रात-रात  भर ॥

 
जिन में चाँद
अमृत घोलेगा
राज कुँवर फिर उसे छकेगा ॥ 


पर उनका क्या होगा, जिनके
थाली   में     रोटी   के   लाले । 
खीर    कहाँ   से   वो   लाएंगे
जिन को मिलते नहीं निवाले ॥ 


पूर्ण चन्द्र फिर पीड़ा देगा
फिर उन का
ललुआ तरसेगा ॥ 


चन्दा तो सब का है,  सब पर 
शीतलता,   चाँदनी    लुटाता ।
काश कि, चन्दा सीधे सब की 
जिह्वा  पर  अमृत  टपकाता ॥

ऐसा हो तो शरद पूर्णिमा 
सार्थक;  सब का
मन हरषेगा ॥ 

          * 
        

Picture: Shubh Sharad Purnima