अब के बादल ऐसे बरसे। भीग गया है मन भीतर से।। कजरायी हर बदली-बदली। नयन-नयन काजल को तरसे।। मौसम के कुछ हुए इशारे। बूँदें निकल पड़ीं सब घर से।। ढरक गयी है रस की गागर। बूँद-बूँद छलकी अम्बर से।। लोक-लाज सब बिसरी राधा। चूनर सरक गयी है सर से।। नाचे मोर पंख फैला कर। मुग्ध मयूरी इस तेवर से।। चलो कदम पर झूला झूलें। भावज चुहल करे देवर से।।
मन बाहर - बाहर को ललचे। खींच रहा कोई भीतर से।। उन्हें 'अरुन' क्या बारिश-बादल। जो दुबके बिजली के डर से।। *
-अरुण मिश्र आया सावन, रिझा रहे बादल। मुझको छत पर बुला रहे बादल।। छत की ख़ल्वत औ' अब्र का मौसम। चाह मीठी, जगा रहे बादल।। धुन जो लब से तेरे चुराये हैं। कानो में गुनगुना रहे बादल।। तेरे भेजे हुए से लगते हैं। हर अदा से लुभा रहे बादल।। याद पर याद आ रही है 'अरुन'। बादलों पर हैं छा रहे बादल।। *