सोमवार, 8 अगस्त 2022

जय-जय संकर जय त्रिपुरारि.../ महाकवि विद्यापति रचित / स्वर : अर्पणा मिश्रा

 https://youtu.be/_H8HDDmpOFo

जय संकर जय त्रिपुरारि। 
जय अध पुरुष जयति अध नारि॥ 
आध धवल तनु आधा गोरा। 
आध सहज कुच आध कटोरा॥ 
आध हड़माल आध गजमोति। 
आध चानन सोह आध विभूति॥ 
आध चेतन मति आधा भोरा। 
आध पटोर आध मुँजडोरा॥ 
आध जोग आध भोग बिलासा। 
आध पिधान आध दिग-बासा॥ 
आध चान आध सिंदूर सोभा। 
आध बिरूप आध जग लोभा॥ 
भने कबिरतन विधाता जाने। 
दुइ कए बाँटल एक पराने॥ 

भावार्थ :

हे शंकर, हे त्रिपुरारी, आपकी जय हो! आधे पुरुष की जय हो,
आधी नारी की जय हो! आधी देह धौली है, आधी गोरी है आधा 
स्तन सपाट है, आधा कटोरे की तरह।आधी माला हाड़ों की है, 
आधी माला गजमोतियों की।आधे में चंदन लगा रखा है, आधे 
में भभूत रमा रखी है।आधा होश ठीक है, आधे में दीवानापन है। 
आधा कटि-सूत्र रेशम का है, आधी मूँज की डोरी है।आधे में योग 
है, आधे में भोग-विलास।आधे में परिधान है, आधे में नंगापन।
आधे में चाँद है, आधे में सिंदूर का टीका। आधा रूप बेढंगा है, 
आधा भुवन-मोहन। विद्यापति ने कहा—“विधाता को ही पता 
होगा कि यह क्या है ! उसी ने एक प्राण को इस तरह दो हिस्सों में 
बाँट रखा है।”

रविवार, 7 अगस्त 2022

राधाधरमधुमिलिंद जय-जय.../ नाटक ‘संगीत सौभद्र' से / रचनाकार : बळवंत पांडुरंग किर्लोस्कर (१८४३ - १८८५) / गायिका - श्रीया सोंडूर

 https://youtu.be/o7VA_PTGEwM  

अण्णा साहेब किर्लोस्कर (जन्म: ३१ मई, १८४३ - मृत्यु: २ नवंबर, १८८५) का वास्तविक 
नाम बळवंत पांडुरंग किर्लोस्कर है। इन्होंने नाटकों के कलापक्ष को समृद्ध किया और मराठी 
रंगमंच की आधुनिक तकनीक आंरभ की। लोकमान्य तिलक के शब्दों में इन्होंने अपने नाटकों 
के द्वारा भारतीय संस्कृति का पुनरुद्वार किया।

राधाधरमधुमिलिंद जय-जय ।
रमारमण हरि गोविंद जय-जय ॥ धृ ॥
कालिंदी–तट-पुलिन-लांच्छित
सुरनुपादारविंद जय-जय ॥१II
उद्‌धृतनग मध्वरिंदमानघ ।
सत्यपांडपटकुविंद जयजय II२II
गोपसदनगुर्वलिंदखेलन ।
बलवत्स्तुतिते न निंद जय-जय॥३II

भावार्थ में सहायक शब्दार्थ 

'पुलिंद' के बजाय 'पुलिन' पढ़ें यह समझ में आता है। 'पुलिन' का अर्थ है नदी के किनारे का रेतीला किनारा। 'कालिंदी–तट-पुलिन-लांच्छित' का अर्थ है यमुना के तट पर रेत से लथपथ शरीर।
सुरनुतपादारविंद -जिसके चरण कमलों में देवता नत (नतमस्तक) हैं.
राधाधरमधुमिलिंद का अर्थ है राधा-अधर-मधु-मिलिंद, राधा के अधर का मधु पीने वाला भ्रमर।
'उद्धृतनग' का अर्थ है (गोवर्धन) पर्वतों को उठाने वाला।
मध्वरिंदमानघ - मधु-अरिंदम-अनघ।
अरि = शत्रु। मधु राक्षस का शमन करने वाली और अघ (पाप) से रहित है।
सत्यपंडपटकुविन्द - सत्यप-अण्ड-पट-कुविंद अंडपट = विश्वरूपी कपड़ा (ब्रह्मांड में अंडा)। कुविन्द = बुनकर। सत्य के संरक्षक और विश्वरूपी वस्त्र के बुनकर।
भाव-गीत 'धागा धागा अखंड बीनूं' को आप इसी अर्थ के साथ जानते हैं।
गोपसदनगुर्वलिंदखेलन - गोपसदन-गुरु-अलिन्द-खेलन।
अलिन्द = प्रांगण। गोप-सदन और गुरु के प्रांगण में एक खिलाड़ी।
बलवत्स्तुतिते न निंद = बलवत्स्तुति को कम मत समझो (बलवंत, यह स्तवन स्वयं नाटककार किर्लोस्कर द्वारा किया गया है)।

शनिवार, 6 अगस्त 2022

श्यामा झूलन पधारो, घिरि आये बदरा.../ पुष्टिमार्ग कीर्तन

 https://youtu.be/id4vcCJXbRU  

श्यामा झूलन पधारो, घिरि आये बदरा...
यह पद प्रभु को हिंडोरे में झुलाते समय नित्य गाया जाता है।

श्यामा झूलन पधारो झुक आये बदरा। राधे झूलन पधारो झुक आये बदरा।।

श्यामा झूलन पधारो झुक आये बदरा ।
घिर आये बदरा झुकआये बदरा ।।१।।

करो सोलह सिंगार नैनन डारो कजरा ।
नैनन डारो कजरा हाथन बांधो गजरा ।।२।।

ऐसो मान मत कीजे हठ तजिये अली ।
तू तो परम् सयानी वृषभान की लली ।।३।।

तेरो रसिक बिहारी मग जोवत खरे ।
सो तो दोऊ कर जोर तोरे चरण परे ।।४।।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

गोवर्धन गिरिधर गोविंद.../ नारायण तीर्थ (१६५०-१७४५) कृति / गायन : श्रीमती कमला सुब्रमण्यम एवं काव्या अजीत

 https://youtu.be/CZyW1CqL_1c   

गोवर्धन गिरिधर गोविंद ...

श्रीमती कमला सुब्रमण्यम, डॉ. लक्ष्मी एस., लक्ष्या विद्यासागर एवं काव्या अजीत की प्रस्तुति
परिवार सच में एक वरदान होता है। एक ही फ्रेम में चार पीढ़ियों की उपस्थिति
मेरे लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। इस वीडियो में मेरी ९० वर्षीय दादी एवं
गुरु श्रीमती कमला सुब्रमण्यम ने मेरे साथ स्वर दिया है और मेरी माँ डॉ. लक्ष्मी एस.
ने अपनी नृत्य भंगिमाओं से चार चाँद लगाए हैं। नन्ही बच्ची लक्ष्या विद्यासागर मेरी
बेटी है।
-काव्या अजीत

पल्लवि
गोवर्धन गिरिधर गोविंद गोकुलपालक परमानंद
(गोवर्धन)

अनुपल्लवि
श्री वत्सांकित श्री कौस्तुभ धर भावक भयहर पाहि मुकुंद
(गोवर्धन)

चरणं
पतित सुररिपु पादप वृंद पावन चरित परामृत कंद
नाट्य रसोत्कट नानाभरण नारायणतीर्थार्चित चरण
(गोवर्धन)

Govardhana Giridhara Govinda

Govardhana Giridhara Govinda
By
Narayana theertha 
Translated by
P.R.Ramachander
Ragam-Mukari
Thalam –Chapu

Pallavi
Govardhana  Giridhara  Govinda
Gokula Palaka  Paramananda

Pallavi
Oh Govinda who lifted  Govardhana mountain,
Oh Divine joy who took care  of  Gokula

Anupallavi
Sri vathsangitha   , Sri kousthubha dara,
pavaka  bhaya hara  pahi mukunda

Anupallavi
Oh God who  had Sri Vathsa on him and  wears the Kausthubha,
Please destroy fears of  good people   and protect me Mukunda

Charanam
Pathitha Sura Ripu , Padapa brinda,
Pavana charithaParamrutha kanda,
Natya rasothkata Nanabharana,
Narayana theertharachitha charana

Charanam
He who felled the enemy of devas using  a  cluster of trees,
He who has a nectar like story  which is holy all over the world,
He who  is interested in dancing   and wears various  ornaments,
He whose feet  has been sung about by Narayana Theertha

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

आरती भानु दुलारी की, कि श्री बरसाने वाली की.../ श्री कृपालु जी रचित / गायिका : अनुप्रिया लमानिया

 https://youtu.be/L4yb3X3-Prg  

आरती भानु दुलारी  की, कि श्री बरसाने वाली की...
श्री कृपालु जी रचित
गायिका - अनुप्रिया लमानिया
कोरस , संगीत - शशि लमानिया

आरती भानु दुलारी की 

कि श्री बरसाने वाली की ।।
आरती भानु दुलारी की ।
कि श्री बरसाने वाली की ।।

विराजै सिंहासन श्यामा ।
दिव्य श्री वृन्दावन धामा ।।
ढुरावै चंवर सुघर बामा ।
पलोटै पग पूरण कामा ।।

लली पग अंक ।
चापी निःशंक ।
श्याम जनु रंक ।।

पाई निधि पारस प्यारी की ।
कि श्री बरसाने वाली की ।।
आरती भानु दुलारी की ।
कि श्री बरसाने वाली की ।।

गौर सिर कनक मुकुट राजै ।
चन्द्रिका चारु सुछवि छाजै ।।
कुटिल कुन्तल अली भल भ्राजै ।
लखत जेहि शिखि कलाप लाजै ।।

मांग सिंदूर ।
मोतियन पूर ।
सजीवन मूर ।।

ब्रह्मा गोवर्धनधारी की ।
कि श्री बरसाने वाली की ।।
आरती भानु दुलारी की ।
कि श्री बरसाने वाली की ।।

श्रवण बिच करणफूल झलकै ।
नासिका बिच बेसर हलकै ।।
गयन बिच प्रेम-सुधा छलकै ।
बंधु बल के लखि लखि ललकै ।।

चपलनथ चमक ।
दसन दुति दमक ।
सुमुखि मुख रमक 
।।

मधुर मुसुकनी सुकुमारी की ।
कि श्री बरसाने वाली की ।।
आरती भानु दुलारी की ।
कि श्री बरसाने वाली की ।।

मोतियन लरु उर मणिमाला ।
चिबुक झलकत इक तिल काला ।।
शम्भू शुक दे संग करताला ।
लली गुन गावती ब्रजबाला ।।

कबहुँ मुख मुरली ।
कबहुँ दृग दुरली ।
कबहुँ दृग जुरली ।।

कबहुँ सुधि भुरनी बिहारी की ।
कि श्री बरसाने वाली की ।।
आरती भानु दुलारी की ।
कि श्री बरसाने वाली की ।।

कीनारिन जरिन नील सारी ।
कंचुकी कुमकुम रंग वारि ।।
चुरी कर कंकन मनहारी ।
छीन कटि किंकिनि छवि न्यारी ।।

पायलनि पगनि ।
मिहावरी लगनि ।
बिछुवनी नगनि ।।

कृपालु सुकृति कुमारी की ।
कि श्री बरसाने वाली की ।।
आरती भानु दुलारी की ।
कि श्री बरसाने वाली की ।।

आरती भानु दुलारी की ।
कि श्री बरसाने वाली की ।।

बुधवार, 3 अगस्त 2022

हे गोविन्द! हे गोपाल! अब तो जीवन हारे.../ रचना : सूरदास / गायन : स्फूर्ति राव

 https://youtu.be/3DP9MXOeJgY


हे गोविन्द! हे गोपाल! अब तो जीवन हारे...
रचना : सूरदास / गायन : स्फूर्ति राव
स्फूर्ति राव 
वर्ष २००५ में जन्मीं स्फूर्ति राव युवा कर्नाटिक संगीत गायिका हैं। 
स्फूर्ति, संगीत की छात्रा हैं और सुपर सिंगर जूनियर सीजन -४ की 
विजेता रही हैं। 

हे गोविन्द हे गोपाल अब तो जीवन हारे |
अब तो जीवन हारे, प्रभु शरण हैं तिहारे ||
हे गोविन्द हे गोपाल अब तो जीवन हारे ||

नीर पिवन हेतु गयो सिन्धू के किनारे,
सिन्धु बीच बसत ग्राह चरण धरि पछारे, 
हे गोविन्द हे गोपाल अब तो जीवन हारे ||

चार पहर युद्ध भयो ले गयो मझधारे,
नाक कान डूबन लागे कृष्ण को पुकारे,
हे गोविन्द हे गोपाल अब तो जीवन हारे ||

द्वारिका में  शब्द गयो  शोर भयो  द्वारे,
शंख चक्र गदा पद्म गरुड़ तजि सिधारे,
हे गोविन्द हे गोपाल अब तो जीवन हारे ||

सूर कहे श्याम सुनो शरण हैं तिहारे,
अबकी बेर पार करो नन्द के दुलारे,
हे गोविन्द हे गोपाल अब तो जीवन हारे ||

|| ओम नमो भगवते वासुदेवाय ||

(टिप्पणी : मूल रचना और गायन के शब्दों में कतिपय स्थानों पर मामूली सा अंतर है।)

सोमवार, 1 अगस्त 2022

नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं.../ शम्भु स्तुति भगवान राम द्वारा / ब्रह्म पुराण से / स्वर : पण्डित हरिनाथ

 https://youtu.be/ptmCIF7ZpiM  

लंका प्रवेश के समय भगवान श्री राम ने रामेश्वरम में स्वयं शिवलिंग की स्थापना 
के साथ भगवान शिव का आह्वान किया था। शम्भु स्तुति को भगवान राम द्वारा 
रचित कहा जाता है, इस शम्भु स्तुति का उल्लेख ब्रह्म पुराण से लिया गया है।

नमामि शम्भो नमामि शम्भो नमामि शम्भो नमामि शम्भो नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं नमामि सर्वज्ञमपारभावम् । नमामि रुद्रं प्रभुमक्षयं तं नमामि शर्वं शिरसा नमामि ॥१॥ नमामि देवं परमव्ययंतं उमापतिं लोकगुरुं नमामि । नमामि दारिद्रविदारणं तं नमामि रोगापहरं नमामि ॥२॥ नमामि कल्याणमचिन्त्यरूपं नमामि विश्वोद्ध्वबीजरूपम् । नमामि विश्वस्थितिकारणं तं नमामि संहारकरं नमामि ॥३॥ नमामि गौरीप्रियमव्ययं तं नमामि नित्यं क्षरमक्षरं तम् । नमामि चिद्रूपममेयभावं त्रिलोचनं तं शिरसा नमामि ॥४॥ नमामि कारुण्यकरं भवस्या भयंकरं वापि सदा नमामि । नमामि दातारमभीप्सितानां नमामि सोमेशमुमेशमादौ ॥५॥ नमामि वेदत्रयलोचनं तं नमामि मूर्तित्रयवर्जितं तम् । नमामि पुण्यं सदसद्व्यतीतं नमामि तं पापहरं नमामि ॥६॥ नमामि विश्वस्य हिते रतं तं नमामि रूपाणि बहूनि धत्ते । यो विश्वगोप्ता सदसत्प्रणेता नमामि तं विश्वपतिं नमामि ॥७॥ यज्ञेश्वरं सम्प्रति हव्यकव्यं तथागतिं लोकसदाशिवो यः । आराधितो यश्च ददाति सर्वं नमामि दानप्रियमिष्टदेवम् ॥८॥ नमामि सोमेश्वरंस्वतन्त्रं उमापतिं तं विजयं नमामि । नमामि विघ्नेश्वरनन्दिनाथं पुत्रप्रियं तं शिरसा नमामि ॥९॥ नमामि देवं भवदुःखशोकविनाशनं चन्द्रधरं नमामि । नमामि गंगाधरमीशमीड्यम् उमाधवं देववरं नमामि ॥१०॥ नमाम्यजादीशपुरन्दरादिसुरासुरैरर्चितपादपद्मम । नमामि देवीमुखवादनाना मिक्षार्थमक्षित्रितयं य ऐच्छत ॥११॥ पंचामृतैर्गन्धसुधूपदीपैर्विचित्रपुष्पैर्विविधैश्च मन्त्रैः । अन्नप्रकारैः सकलोपचारैः सम्पूजितं सोममहं नमामि ॥१२॥

॥ इति श्रीब्रह्ममहापुराणे शम्भुस्तुतिः सम्पूर्णा ॥

अर्थ 

श्रीराम उवाच 
नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं नमामि सर्वज्ञमपारभावम् ।
नमामि रुद्रं प्रभुमक्षयं तं नमामि शर्वं शिरसा नमामि ॥ १॥ 

श्रीराम बोले–मैं पुराणपुरुष शम्भुको नमस्कार करता हूँ । जिनकी असीम सत्ता
का कहीं पार या अन्त नहीं है,हैउन सर्वज्ञ शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। । 
अविनाशी प्रभु रुद्रको नमस्कार करता हूँ। सबका संहार करनेवाले शर्वको मस्तक 
झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ १॥ 

नमामि देवं परमव्ययं तमुमापतिं लोकगुरुं नमामि । 
नमामि दारिद्र्यविदारणं तं नमामि रोगापहरं नमामि ॥ २॥
 

अविनाशी परमदेवको नमस्कार करता हूँ । लोकगुरु उमापतिको प्रणाम करता हूँ । 

दरिद्रताको विदीर्ण करनेवाले [शिव]-को नमस्कार करता हूँ । रोगोंका विनाश 
करनेवाले महेश्वरको प्रणाम करता हूँ ॥ २॥ 

नमामि कल्याणमचिन्त्यरूपं नमामि विश्वोद्भवबीजरूपम् ।
नमामि विश्वस्थितिकारणं तं नमामि संहारकरं नमामि ॥ ३॥ 

जिनका रूप चिन्तनका विषय नहीं है,हैउन कल्याणमय शिवको नमस्कार करता हूँ । 
विशवकी उत्पत्तिके बीजरूप भगवान भवको प्रणाम करता हूँ । जगतका पालन 
करनेवाले परमात्माको नमस्कार करता हूँ । संहारकारी रुद्रको नमस्कार करता हूँ॥ ३॥ 

नमामि गौरीप्रियमव्ययं तं नमामि नित्यं क्षरमक्षरं तम् ।
तम् नमामि चिद्रूपममेयभावं त्रिलोचनं तं शिरसा नमामि ॥ ४॥ 

पार्वतीजीके प्रियतम अविनाशी प्रभुको नमस्कार करता हूँ । नित्य क्षर-अक्षरस्वरूप 
शंकरको प्रणाम करता हूँ । जिनका स्वरूप चिन्मय है और अप्रमेय है, उन भगवान 
त्रिलोचनको मैं मस्तक झुकाकर बारम्बार नमस्कार करता हूँ ॥ ४॥ 

नमामि कारुण्यकरं भवस्य भयंकरं वाऽपि सदा नमामि । 
नमामि दातारमभीप्सितानां नमामि सोमेशमुमेशमादौ ॥ ५॥ 

करुणा करनेवाले भगवान शिवको प्रणाम करता हूँ तथा संसारको भय देनेवाले भगवान 
भूतनाथको सर्वदा नमस्कार करता हुँ । मनोवांछित फलोंके दाता महेशवरको प्रणाम 
करता हूँ । भगवती उमाके स्वामी श्रीसोमनाथको नमस्कार करता हूँ ॥ ५॥ 

नमामि वेदत्रयलोचनं तं नमामि मूर्तित्रयवर्जितं तम् ।
नमामि पुण्यं सदसद्व्यतीतं नमामि तं पापहरं नमामि ॥ ६॥ 

तीनों वेद जिनके तीन नेत्र हैं, उन त्रिलोचनको प्रणाम करता हूँ । त्रिविध मूर्तिसे रहित 
सदाशिवको नमस्कार करता हूँ । पुण्यमय शिवको प्रणाम करता हूँ । सत्-असत्से पृथक् 
परमात्माको नमस्कार करता हूँ । पापोंको नष्ट करनेवाले भगवान हरको प्रणाम करता हूँ ॥ ६॥ 

नमामि विश्वस्य हिते रतं तं नमामि रूपाणि बहूनि धत्ते । 
यो विश्वगोप्ता सदसत्प्रणेता नमामि तं विश्वपतिं नमामि ॥ ७॥
 
जो विश्वके हितमें लगे रहते हैं, बहुत-से रूप धारण करते हैं, उन भगवान शंकरको मैं प्रणाम 
करता हूँ । जो संसारके रक्षक तथा सत् और सत् असत्के निर्माता हैं, उन विशवपति 
(भगवान् विश्वनाथ भगवान् ) -को मैं नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ ॥ ७॥ 

यज्ञेश्वरं सम्प्रति हव्यकव्यं तथागतिं लोकसदाशिवो यः । 
आराधितो यश्च ददाति सर्व नमामि दानप्रियमिष्टदेवम् ८॥ 

हव्य-कव्यस्वरूप यज्ञेश्वरको नमस्कार करता हूँ । सम्पूर्ण लोकोंका सर्वदा कल्याण करनेवाले 
जो भगवान शिव आराधना करनेपर उत्तम गति एवं सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं, 
उन दानप्रिय इष्टदेवको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ८॥ 

नमामि सोमेशवरमस्वतन्त्रमुमापतिं तं विजयं नमामि । 
नमामि विघ्नेशवरनन्दिनाथं पुत्रप्रियं तं शिरसा नमामि ॥ ९॥ 

भगवान सोमनाथको प्रणाम करता हूँ । जो स्वतन्त्र न रहकर भक्तोंके वश रहते हैं, उन 
विजयशील उमानाथको मैं नमस्कार करता हूँ । विघ्नराज गणेश तथा नन्दीके स्वामी पुत्रप्रिय 
भगवान् शिवको भगवान् मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९॥ 

नमामि देवं भवदुःखशोकविनाशनं चन्द्रधरं नमामि । 
नमामि गङ्गाधरमीशमीड्यमुमाधवं देववरं नमामि ॥ १०॥ 

संसारके दुःख और शोकका नाश करनेवाले देवता भगवान् चन्द्रशेखरको मैं बारम्बार 
नमस्कार करता हूँ । जो स्तुति करनेयोग्य और मस्तकपर गंगाजीको धारण करनेवाले हैं, 
उन महेश्वरको नमस्कार करता हूँ । देवताओंमें श्रेष्ठ उमापतिको प्रणाम करता हूँ ॥ १०॥

 नमाम्यजादीशपुरन्दरादिसुरासुरैरचितपादपद्मम् । 
नमामि देवीमुखवादनानामीक्षार्थमक्षित्रितयं य ऐच्छत् ११॥ 

कमलोंकी पूजा करते हैं, उन भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ । जिन्होंने पार्वतीदेवीके मुखसे 
निकलनेवाले वचनोंपर दृष्टिपात करनेको इच्छासे मानो तीन नेत्र धारण कर रखे हैं, उन 
भगवानको प्रणाम करता हूँ ॥ ११॥ 

पञ्चामृतैर्गन्धसुधूपदीपैर्विचित्रपुष्पैर्विविधैश्च मन्त्रैः । 
अन्नप्रकारैः सकलोपचारैः सम्पूजितं सोममहं नमामि ॥ १२॥

पंचामृत , चन्दन, उत्तम धूप , दीप, भाँति-भाँतिके विचित्र पुष्प , मन्त्र तथा अन्न आदि समस्त 
उपचारोंसे पूजित भगवान सोमको में नमस्कार करता हूँ ॥ १२॥ 

॥ इति श्रीब्रह्ममहापुराणे शम्भुस्तुतिः सम्पूर्णा ॥ 
॥ इस प्रकार श्रीब्रह्ममहापुराणमें शम्भुस्तुति सम्पूर्ण हुई ॥