जय संकर जय त्रिपुरारि। जय अध पुरुष जयति अध नारि॥ आध धवल तनु आधा गोरा। आध सहज कुच आध कटोरा॥ आध हड़माल आध गजमोति। आध चानन सोह आध विभूति॥ आध चेतन मति आधा भोरा। आध पटोर आध मुँजडोरा॥ आध जोग आध भोग बिलासा। आध पिधान आध दिग-बासा॥ आध चान आध सिंदूर सोभा। आध बिरूप आध जग लोभा॥ भने कबिरतन विधाता जाने। दुइ कए बाँटल एक पराने॥
भावार्थ :
हे शंकर, हे त्रिपुरारी, आपकी जय हो! आधे पुरुष की जय हो, आधी नारी की जय हो! आधी देह धौली है, आधी गोरी है आधा स्तन सपाट है, आधा कटोरे की तरह।आधी माला हाड़ों की है, आधी माला गजमोतियों की।आधे में चंदन लगा रखा है, आधे में भभूत रमा रखी है।आधा होश ठीक है, आधे में दीवानापन है। आधा कटि-सूत्र रेशम का है, आधी मूँज की डोरी है।आधे में योग है, आधे में भोग-विलास।आधे में परिधान है, आधे में नंगापन। आधे में चाँद है, आधे में सिंदूर का टीका। आधा रूप बेढंगा है, आधा भुवन-मोहन। विद्यापति ने कहा—“विधाता को ही पता होगा कि यह क्या है ! उसी ने एक प्राण को इस तरह दो हिस्सों में बाँट रखा है।”
गोपसदनगुर्वलिंदखेलन । बलवत्स्तुतिते न निंद जय-जय॥३II
भावार्थ में सहायक शब्दार्थ
'पुलिंद' के बजाय 'पुलिन' पढ़ें यह समझ में आता है। 'पुलिन' का अर्थ है नदी के किनारे का रेतीला किनारा। 'कालिंदी–तट-पुलिन-लांच्छित' का अर्थ है यमुना के तट पर रेत से लथपथ शरीर।
सुरनुतपादारविंद -जिसके चरण कमलों में देवता नत (नतमस्तक) हैं.
राधाधरमधुमिलिंद का अर्थ है राधा-अधर-मधु-मिलिंद, राधा के अधर का मधु पीने वाला भ्रमर।
'उद्धृतनग' का अर्थ है (गोवर्धन) पर्वतों को उठाने वाला।
मध्वरिंदमानघ - मधु-अरिंदम-अनघ।
अरि = शत्रु। मधु राक्षस का शमन करने वाली और अघ (पाप) से रहित है।
सत्यपंडपटकुविन्द - सत्यप-अण्ड-पट-कुविंद अंडपट = विश्वरूपी कपड़ा (ब्रह्मांड में अंडा)। कुविन्द = बुनकर। सत्य के संरक्षक और विश्वरूपी वस्त्र के बुनकर।
भाव-गीत 'धागा धागा अखंड बीनूं' को आप इसी अर्थ के साथ जानते हैं।
गोपसदनगुर्वलिंदखेलन - गोपसदन-गुरु-अलिन्द-खेलन।
अलिन्द = प्रांगण। गोप-सदन और गुरु के प्रांगण में एक खिलाड़ी।
बलवत्स्तुतिते न निंद = बलवत्स्तुति को कम मत समझो (बलवंत, यह स्तवन स्वयं नाटककार किर्लोस्कर द्वारा किया गया है)।
श्रीराम बोले–मैं पुराणपुरुष शम्भुको नमस्कार करता हूँ । जिनकी असीम सत्ता का कहीं पार या अन्त नहीं है,हैउन सर्वज्ञ शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। । अविनाशी प्रभु रुद्रको नमस्कार करता हूँ। सबका संहार करनेवाले शर्वको मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ १॥
अविनाशी परमदेवको नमस्कार करता हूँ । लोकगुरु उमापतिको प्रणाम करता हूँ । दरिद्रताको विदीर्ण करनेवाले [शिव]-को नमस्कार करता हूँ । रोगोंका विनाश करनेवाले महेश्वरको प्रणाम करता हूँ ॥ २॥
जिनका रूप चिन्तनका विषय नहीं है,हैउन कल्याणमय शिवको नमस्कार करता हूँ । विशवकी उत्पत्तिके बीजरूप भगवान भवको प्रणाम करता हूँ । जगतका पालन करनेवाले परमात्माको नमस्कार करता हूँ । संहारकारी रुद्रको नमस्कार करता हूँ॥ ३॥
पार्वतीजीके प्रियतम अविनाशी प्रभुको नमस्कार करता हूँ । नित्य क्षर-अक्षरस्वरूप शंकरको प्रणाम करता हूँ । जिनका स्वरूप चिन्मय है और अप्रमेय है, उन भगवान त्रिलोचनको मैं मस्तक झुकाकर बारम्बार नमस्कार करता हूँ ॥ ४॥
करुणा करनेवाले भगवान शिवको प्रणाम करता हूँ तथा संसारको भय देनेवाले भगवान भूतनाथको सर्वदा नमस्कार करता हुँ । मनोवांछित फलोंके दाता महेशवरको प्रणाम करता हूँ । भगवती उमाके स्वामी श्रीसोमनाथको नमस्कार करता हूँ ॥ ५॥
तीनों वेद जिनके तीन नेत्र हैं, उन त्रिलोचनको प्रणाम करता हूँ । त्रिविध मूर्तिसे रहित सदाशिवको नमस्कार करता हूँ । पुण्यमय शिवको प्रणाम करता हूँ । सत्-असत्से पृथक् परमात्माको नमस्कार करता हूँ । पापोंको नष्ट करनेवाले भगवान हरको प्रणाम करता हूँ ॥ ६॥
जो विश्वके हितमें लगे रहते हैं, बहुत-से रूप धारण करते हैं, उन भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । जो संसारके रक्षक तथा सत् और सत् असत्के निर्माता हैं, उन विशवपति (भगवान् विश्वनाथ भगवान् ) -को मैं नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ ॥ ७॥
हव्य-कव्यस्वरूप यज्ञेश्वरको नमस्कार करता हूँ । सम्पूर्ण लोकोंका सर्वदा कल्याण करनेवाले जो भगवान शिव आराधना करनेपर उत्तम गति एवं सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं, उन दानप्रिय इष्टदेवको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ८॥
भगवान सोमनाथको प्रणाम करता हूँ । जो स्वतन्त्र न रहकर भक्तोंके वश रहते हैं, उन विजयशील उमानाथको मैं नमस्कार करता हूँ । विघ्नराज गणेश तथा नन्दीके स्वामी पुत्रप्रिय भगवान् शिवको भगवान् मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९॥
संसारके दुःख और शोकका नाश करनेवाले देवता भगवान् चन्द्रशेखरको मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ । जो स्तुति करनेयोग्य और मस्तकपर गंगाजीको धारण करनेवाले हैं, उन महेश्वरको नमस्कार करता हूँ । देवताओंमें श्रेष्ठ उमापतिको प्रणाम करता हूँ ॥ १०॥
कमलोंकी पूजा करते हैं, उन भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ । जिन्होंने पार्वतीदेवीके मुखसे निकलनेवाले वचनोंपर दृष्टिपात करनेको इच्छासे मानो तीन नेत्र धारण कर रखे हैं, उन भगवानको प्रणाम करता हूँ ॥ ११॥