शनिवार, 31 जनवरी 2015

न जाने किन ज़मीनों से (ग़ज़ल एवं नज़्म संग्रह ) - अरुण मिश्र.

न जाने किन ज़मीनों से (ग़ज़ल एवं नज़्म संग्रह )
- अरुण मिश्र
मोबाइल  09935232728
ई-मेल     arunk.1411@gmail.com



सद्यः प्रकाशित (जनवरी, २०१५ )

अयन प्रकाशन
1 / 20, महरौली,
नई दिल्ली -110030 

सम्पर्क : 09818988613



















गुरुवार, 1 जनवरी 2015

इस नये साल में ये पहली दुआ है मेरी …..

नव वर्ष सभी को मंगलमय हो । 

इस नये  साल में  ये पहली दुआ है मेरी  ….. 

-अरुण मिश्र



  
२०१५ 

 
 

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

गोमती-आरती



गोमती-आरती

-अरुण मिश्र 

जयति जय-जय,
जयति जय-जय,
जयति जय-जय,     
जयति जय।
जय गोमती, जय गोमती,
जय गोमती, जय गोमती।।


           तुम  आदि गंगा हो  रुचिर,
           दुहिता  महर्षि वशिष्ठ की।
           जलदायिनी,  फलदायिनी,
           वरदायिनी हो  अभीष्ट की।।


छू चरण नैमिष तीर्थ का,
पुर लक्ष्मण मुख  चूमती।
जय गोमती, जय गोमती,
जय गोमती, जय गोमती।।


           जय पुण्यसलिला, सदानीरा,
           निर्मला,      रुचिरा      नदी।
           कलि-कलुष नाशिनि,   माँ-
           सुहासिनि चन्द्रिका की कौमुदी।।


हो अवध का हिय-हार, निज   
रस-धार से भू सींचती।
जय गोमती, जय गोमती,
जय गोमती, जय गोमती।।


           चित्रित  अवध का  भू-पटल
           कर,  शस्य-श्यामल  रंग में।
           लहती  परम  विश्रान्ति  माँ,
           हो  कर   समाहित  गंग  में।।


करतीं तरंगित हर हृदय,
तेरी    तरंगें   झूमती।
जय गोमती, जय गोमती,
जय गोमती, जय गोमती।।


           शोभित मनोहर घाट हों  सब;
           स्वच्छ,    सुन्दर    कूल   हो।
           माँ ! नित्य मज्जन-पान हित,
           जल     सर्वथा   अनुकूल   हो।।


तव तीर-वासी-जन सदा,
गाते   सुमंगल   आरती।
जय गोमती, जय गोमती,
जय गोमती, जय गोमती।।


जयति जय-जय,
जयति जय-जय
जयति जय-जय,     
जयति जय।
जय गोमती, जय गोमती,
जय गोमती, जय गोमती।।

                                   *

 

शनिवार, 29 नवंबर 2014

लक्ष्मणपुर (लखनऊ को समर्पित एक कविता)

लक्ष्मणपुर

-अरुण मिश्र 

(लखनऊ को समर्पित एक कविता)







































 'अंजलि भर भाव के प्रसून ' काव्य-संग्रह से साभार  

सोमवार, 17 नवंबर 2014

महर्षि वाल्मीकि विरचित गङ्गाष्टक का काव्य-भावानुवाद

 महर्षि वाल्मीकि विरचित गङ्गाष्टक का
काव्य-भावानुवाद 




अनुवाद गत वर्षों में पूर्व प्रकाशित  
 
                               -अरुण मिश्र 
 
 
 
 
 
 
 

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

अस्तंगत सूर्य को एक अर्घ्य मेरा भी....




अस्तंगत सूर्य को एक अर्घ्य मेरा भी.......

-अरुण मिश्र.

अस्तंगत सूर्य को एक अर्घ्य मेरा भी ||

दे रहीं असंख्य अर्घ्य,
गंगा की ऊर्मियाँ |
धरती पर जीवन के -
छंद , रचें रश्मियाँ ||


चम्पई उजाला भी , रेशमी अंधेरा भी |
अस्तंगत सूर्य को एक अर्घ्य मेरा भी ||


ऊर्जित कर कण-कण ;
शांत, शमित तेज प्रखर |
विहंगों के कलरव में ,
स्तुति के गीत मुखर ||


ढलता तो रात और उगे तो सवेरा भी |
अस्तंगत सूर्य को एक अर्घ्य मेरा भी ||


उदय-अस्त की माला
को अविरल फेरता |
सृष्टि - चक्र - मर्यादा -
मंत्र , नित्य टेरता ||


जीवन उत्थान-पतन, सुख-दुख का फेरा भी |
अस्तंगत सूर्य को एक अर्घ्य मेरा भी ||


                                 *
(पूर्वप्रकाशित)

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

अंकुश-पाश- कमल कर....

काव्यभावानुवाद  :
 
-अरुण मिश्र 
 
 
श्वेत  अंग  हैं,  श्वेत  वस्त्र  हैं,   श्वेत   पुष्प- चन्दन   से  पूजित ।
रत्नसिंहासन    क्षीरसिंधु-तट,   रत्नदीप   से    सुर-नर   अर्चित । 
चंद्रमौलि,   त्रिनेत्र,   अभय-वर दाता,    अंकुश-पाश- कमल  कर ;
शुभ-लक्ष्मी, गणपति-प्रसन्न का, शांति हेतु निज ध्यान सदा धर । । 
                                                    *
  
 

मूल संस्कृत  : 
 
श्वेताङ्गम्  श्वेतवस्त्रम्  सितकुसुमगणैः पूजितं श्वेतगन्धैः 
क्षीराब्धौ     रत्नदीपैः    सुरनरतिलकं    रत्नसिंहासनस्थम् ।
दोर्भिः    पाशाङ्कुशाब्जाभयवरमनसं    चन्द्रमौलिं    त्रिनेत्रं 
ध्यायेच्छान्त्यर्थमीशं   गणपतिममलं   श्रीसमेतं   प्रसन्नम् ।। 
                                                *