https://youtu.be/U_vGie0HaRk
ब्रज नव तरुणि-कदम्ब मुकुटमणि,
श्यामा आजु बनी।
नख-सिख लौं अँग-अंग माधुरी,
मोहे श्याम धनी॥
यौं राजत कवरी गूँथित कच,
कनक-कंज-वदनी।
चिकुर चंद्रिकन बीच अर्ध बिधु,
मानौँ ग्रसित फनी॥
सौभग रस सिर स्रवत पनारी,
पिय सीमन्त ठनी।
भृकुटि काम-कोदंड नैंन-सर,
कज्जल रेख अनी॥
तरल तिलक, ताटंक गंड पर,
नासा जलज मनी।
दसन कुन्द, सरसाधर पल्लव,
प्रीतम मन समनी॥
चिबुक मध्य अति चारु सहज सखि,
साँवल बिंदुकनी।
प्रीतम प्राण रतन संपुट कुच,
कंचुकि कसिब तनी॥
भुज-मृनाल बल हरत बलय जुत,
परस सरस स्रवनी।
श्याम सीस तरु मनौ मिडवारी,
रची रुचिर रवनी॥
नाभि गंभीर मीन मोहन मन,
खेलन कौँ हृदनी।
कृस कटि, पृथु नितम्ब किंकिनि व्रत,
कदलि-खंभ जघनी॥
पद अम्बुज जावक जुत भूषण,
प्रीतम उर अवनी।
नव-नव भाय विलोभि भाम इभ,
बिहरत वर करिनी॥
(जै श्री) हित हरिवंश प्रशंसित श्यामा,
कीरति विशद घनी।
गावत स्रवनन सुनत सुखाकर,
विश्व दुरित दवनी॥
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