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बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

बादलों से बरस रहीं यादें....

ग़ज़ल 
A walk in the rain

बादलों से बरस रहीं यादें....

-अरुण मिश्र.

बादलों    से,    बरस     रहीं    यादें। 
मेरे   मन   में   हुलस    रहीं   यादें।। 

रुत  तो  बस,  आने का  बहाना  है। 
साल   भर    से,   तरस  रहीं   यादें।। 

अब समा के,  न दिल से निकलेंगी। 
बन्द,   सीने   के,  कस   रहीं   यादें।। 

संग   हवाओं   के,   पहले  लहरायें। 
फिर हैं  नागिन सी,  डस रहीं  यादें।।
  
मैं शजर गोया,  लिपट कर  मुझसे। 
बेल   सी,   देखो   लस   रहीं   यादें।। 

गुज़रे लम्हों के, गुलाबों में ‘अरुन’। 
हैं  महक  बन के,  बस   रहीं  यादें।।
                               *  

रविवार, 20 जनवरी 2013

इन अ’शआर का बाँकपन भी तो देखो....


ग़ज़ल

इन अ’शआर का बाँकपन भी तो देखो....

-अरुण मिश्र 

वो  सूरत   ‘अरुन’ ,  ख़ूबसूरत बला की।
जलाया जो दिल, हमने कीमत अदा की।।
  
नहीं    बेसबब ,    शौक़े - दीदारे - साक़ी।
अभी  तो  बची है ,  बहुत   प्यास  बाकी।।
  
बहकने  पे  मेरे ,   उसी  को   शिक़ायत।
उसी  ने  तो  ये   मस्तियां  हैं  अता  की।।
  
थिरकते  हुये  पाँव ,  सब   उसके   देखें।
कोई  देखे  लग्ज़िश,  हमारे भी   पा की।।
  
इन  अ’शआर का बाँकपन भी तो देखो।
जो   लेते   बलायें  हो   उसके  अदा  की।। 
                                 *

रविवार, 13 जनवरी 2013

ऐ! अरुन हुशियार.........

ग़ज़ल 

ऐ! अरुन हुशियार.....

-अरुण मिश्र.

फूल  कर  कुप्पा  गधा  हैरत  से;  ये क्या माज़रा ? 
लगता   है    मैदान  सब  बैसाख   में   मैंने   चरा।। 

ख़ुशफ़हम  बीनाई उनकी, दीठ  उनकी  बाकमाल। 
सावनी  अंधों   को  सूझे,   चार-सू   आलम,  हरा।।
  
अगर  अल्ला  मेह्रबां,  तो   है   गधा  भी  पेहलवां। 
खा  के  हलुआ  मस्त  है,  दाने  बिना  घोड़ा  मरा।।
  
आस्तीं  में   पल  रहे  हैं,  बाँबियों  को  छोड़  कर। 
सिर्फ़   डसने  के  लिये,  है  भेस  इन्सां  का  धरा।।
  
लो!  छछुंदर,  डाल कर  सर पे  चमेली,  चल पड़ी।
ऐ! ‘अरुन’ हुशियार, तिरछी चाल से बचियो जरा।।
                                              *  

      

सोमवार, 7 जनवरी 2013

मौत के मुँह में गये फिर आ गये वापस हैं हम..........

मौत के मुँह में गये फिर आ गये वापस हैं हम....

-अरुण मिश्र.

मौत के  मुँह में गये,  फिर आ गये  वापस हैं हम। 
इश्क़ करके भी हैं ज़िंदा,  साहिबे-किस्मत हैं हम।।
  
कैसे-कैसे है निभाया, किससे-किससे,  क्या कहें? 
जो डसे,  उससे ही,  पानी  माँगने  लायक  हैं हम।।
  
सोहबते-दानिशवरां   से,  रफ़्ता-रफ़्ता   ही  सही। 
सबके-सब  हम्माम में नंगे;  हुये क़ायल  हैं  हम।।
  
तू  ‘अरुन’ मत रो  कि,  तेरे साथ ही  बह जायेंगे। 
यूँ  तो हैं कालिख़ सही, पै आँख के काजल हैं हम।। 
                                           *