शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

छठ पर्व पर विशेष





अस्तंगत सूर्य को एक अर्घ्य मेरा भी...

- अरुण मिश्र 


अस्तंगत   सूर्य  को   एक  अर्घ्य   मेरा  भी ||

                              दे   रहीं  असंख्य  अर्घ्य, 
                              गंगा      की      ऊर्मियाँ |
                              धरती   पर   जीवन  के -
                              छंद  ,    रचें    रश्मियाँ ||

चम्पई   उजाला   भी ,  रेशमी   अंधेरा   भी |
अस्तंगत   सूर्य  को   एक  अर्घ्य   मेरा  भी ||


                              ऊर्जित  कर  कण-कण ; 
                              शांत, शमित तेज प्रखर |
                               विहंगों   के  कलरव  में ,
                               स्तुति के  गीत   मुखर ||

ढलता   तो   रात   और  उगे  तो  सवेरा  भी |
अस्तंगत   सूर्य  को   एक  अर्घ्य   मेरा  भी ||


                                 उदय-अस्त की माला 
                                 को   अविरल   फेरता |
                                 सृष्टि - चक्र  - मर्यादा -
                                 मंत्र ,   नित्य   टेरता ||


जीवन उत्थान-पतन,सुख-दुख का फेरा भी | 
अस्तंगत   सूर्य  को   एक  अर्घ्य   मेरा  भी ||
                                   *
- See more at: http://arunmishra-rashmirekh.blogspot.in/2010/11/blog-post_12.html#sthash.lkcoOi59.dpuf

(गत वर्षों में इसी ब्लॉग में पूर्व प्रकाशित । )

बुधवार, 28 अगस्त 2013

बाल-मुकुन्द का, मन से है स्मरण..….

Krishna Vatapathra-Shayee
वट-पत्र-पुट में, सुख से शयन-रत... 

भावानुवाद :

अरविन्द कर से, अरविन्द पद को,
          अरविन्द मुख में   विनिवेश करते;
वट-पत्र-पुट में, सुख से  शयन-रत,
          बाल-मुकुन्द का, मन से है स्मरण।।

                                               -अरुण मिश्र. 
मूल संस्कृत श्लोक :

करारविन्देन पदारविन्दं 
मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम।
वटस्य पत्रस्य पुटे  शयानं 
बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि।।  

 Ref :

Leela Sukha(Bilvamangala Thakur) in one of his Krishna Karnamritha slokas 2.57 describes the baby (Bala-Mukunda) that floats on the pralaya waters on top of a banyan leaf after swallowing the universe and its contents for their protection: 

kararavindhena padharavindam / mukharavindhe vinivesayantham
vatasya patrasya pute shayanam / balam-mukundam manasa smarami

(Translation) With His soft lotus hands, our baby Mukunda has grabbed His lotus like toe and placed it in His lotus mouth, decorated with red lips, and sucks on it in amusement as He rests on the tender shoot of a banyan leaf contemplating on the next cycle of creation.
                                                     
                                                 -Image and reference courtesy Hare Krishna Temple Portal.

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

'शिव' बिन सूना गीत शिवालय....


स्वर्गीय श्रद्धेय भदौरिया जी (डॉ. शिव बहादुर सिंह) 
को विनम्र श्रद्धांजलि 

टिप्पणी : दिनांक १९.०८.२०१३, सोमवार को श्रद्धेय भदौरिया जी के श्राद्ध में सम्मिलित
होने के लिए लालगंज, रायबरेली जाते समय मन में जो श्रद्धा-प्रवाह उमड़ा, उसे छन्दों 
में बाँधने का प्रयास किया है।
*''हिरन कि गाय कि बाघ कि बकरी??'' - भदौरिया जी की प्रसिद्ध कविता, 'नदी का 
बहना मुझ में हो' की एक  पंक्ति है। भदौरिया जी के स्वर में इस कविता की वीडियो 
क्लिपिंग प्रस्तुत है।       



'शिव' बिन सूना गीत-शिवालय.… 

ब्रह्मनाद    में   लीन   हुआ   स्वर,
महाज्योति  में  ज्योति हुई  लय।

           जाने   को   सब  जाते  इक  दिन,
           यह     असार    संसार     छोड़ते।
           तुम    परम्परा   के   वाहक    थे,
           कैसे     शाश्वत   नियम    तोड़ते??

किन्तु,   तुम्हारे  जाने  से  'शिव'
सूना - सूना       गीत - शिवालय।।

           हर    प्यासे   के    लिए   नदी  थे;
           हर   कोई      भर   लाता    गगरी।
           तृषा      बुझाएंगे      अब      कैसे,
           हिरन कि गाय कि बाघ कि बकरी??*
  
जब  तक  जीवित  रहे,   धरा  पर
थे  शिवत्व  के   जीवित  परिचय।।

           तुम   चन्दन  वन   की   छाया  थे-
           सघन,   जहाँ   शीतल  होता  मन।
           'शिव' तेरा सान्निध्य  क्षणिक भी,
           पारस   सम,   करता  था   कंचन।।

क्षीण   भले,     क्षयमान   कलेवर,
पर,   कृतित्व  की   आभा  अक्षय।।

                                                     -अरुण मिश्र .    
         

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

विनम्र श्रद्धांजलि

विनम्र श्रद्धांजलि 
मूर्धन्य गीतकार, श्रेष्ठ शब्द-शिल्पी, 
अप्रतिम साहित्यकार, ऋषितुल्य, 
परम श्रद्धेय 
डा० शिव बहादुर सिंह भदौरिया जी को,
जो मंगलवार, ०६, अगस्त,२०१३ को 
स्मृति शेष हो गये।   

  

डा० शिव बहादुर सिंह भदौरिया जी द्वारा काव्य पाठ 
करते हुए  यह क्लिपिंग, दिनांक ०२ जून, २००७ को मेरे लखनऊ स्थित आवास पर आयोजित गोष्ठी के अवसर की है।
                                                                                                 -अरुण मिश्र . 

    


सोमवार, 29 जुलाई 2013

आभार



आभार

'रश्मि-रेख' में पहली पोस्ट  'रश्मि-रेख-आमंत्रण', २३ जुलाई, २०१०, की है 
इस लिहाज से जुलाई, २०१३ में इसके तीन वर्ष पूरे हो गए 

मेरे लिए यह संतोष की बात है कि, ब्लॉगर के स्टैट्स के अनुसार इस अवधि 
में आज की तिथि तक १०३०८  पेज व्यूज  हुए हैं जो, औसतन १० प्रतिदिन है 
इस अवधि में १७ समर्थक भी मिले हैं, और ४३७ लोगों ने प्रोफाइल में रूचि 
ली है 

अपने सहृदय शुभचिंतकों के इस सतत स्नेह से मैं अभिभूत हूँ मुझे इस 
बात की संतुष्टि है कि, आप सब तक पहुँच कर मेरी रचनाएँ सार्थक हुईं 
इनकी स्वीकार्यता के प्रति भी किञ्चित आश्वस्त  हो सका हूँ 

अपनी ब्लॉग-यात्रा के इस पड़ाव पर, लगातार साथ दे कर, मेरा 
उत्साह वर्धन करते रहने के लिए, मैं आप सब का हृदय से कृतज्ञ हूँ 

मैं विशेष कर अपने उन शुभेच्छुओं  का आभारी हूँ जिन्होंने पहले वर्ष में, 
समर्थन, मार्गदर्शन एवं टिप्पणियां दे कर कर मुझे उपकृत करने की कृपा की

आप सभी, जो मेरे ब्लॉग तक पहुंचे, मेरे दिल के बहुत करीब हैं अनुभूतियों के 
इस लेन-देन में धन्यवाद बहुत छोटा शब्द है। अस्तु , मैं पुनः-पुनः सभी को 
अपनी विनम्र कृतज्ञता अर्पित करता हूँ 

बहुत-बहुत आभार 

-अरुण मिश्र.

 'शाकुन्तलम',
  ४ /११३, विजयन्त खण्ड, गोमती नगर,
  लखनऊ -२२६०१०. 

  arunk.1411@gmail.com

  मोबाइल : ०९९३५२३२७२८    
                         

शनिवार, 20 जुलाई 2013

रहने दो म्यां हियां पर दीनो-धरम की बातें.....


रहने दो म्यां हियां पर दीनो-धरम की बातें...

-अरुण मिश्र.

रहने दो म्यां  हियां पर,  दीनो-धरम की  बातें।    
दैरो-हरम  में  जँचतीं,   दैरो-हरम   की   बातें॥

उसके  ख़याल को   हैं,  दिल को हमारे  यकसां।  

ज़ोरो-सितम  की  बातें,  मेह्रो-करम  की  बातें॥

जो कुछ है सब उसी का, यां कुछ नहीं किसी का।  

इसके  अलावा जो भी,  सब  हैं  भरम  की  बातें॥

टुक  मेरे  पास  बैठो, तुम भी  'अरुन' से  सीखो।  

हसरत की, दर्दो-ग़म की,दिल के मरम की बातें॥
                                           *

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

मेरा मन केदारनाथ में .....


The hellish rains have turned Kedarnath into a ghost town. Though the outer structure of the temple seems intact, there are bodies piled up outside its gate.  Kedarnath shrine, one of the holiest of Hindu temples dedicated to Lord Shiva, and other buildings are seen damaged. (PTI)
                     मलबों  में  सिसकी  लेती  हैं जाने  कितनी  करुण-कथायें ...










मेरा मन केदारनाथ में .....                

-अरुण मिश्र.

यूँ   तो  मैं  घर  में   बैठा हूँ,
मेरा   मन   केदारनाथ   में।।

जहाँ प्रकृति ताण्डव-लीला-रत;
पागल   जहाँ   हुये   हैं   बादल।
घूम  रहा  है   उस   प्रान्तर  में,
पर्वत - पर्वत,  जंगल - जंगल।।

मेरा  मन   उनसे  जुड़ता  है,
बचा न जिनके कोई साथ में।।

किसका  साथ  कहाँ  पर छूटा?
अन्तहीन   बह  रहीं   व्यथायें।
मलबों  में   सिसकी  लेती   हैं,
जाने  कितनी   करुण-कथायें।।

संग  तुम्हारे, सब सनाथ थे;
कैसे, कुछ  बदले अनाथ में??

जो   विनशे   विनाश-लीला  में,
उनके प्रति यह हृदय, द्रवित है।
किन्तु, प्रलय से जो बच निकले,
उन्हें  देख,   मन   रोमांचित  है।।

कौन  जियेगा,  कौन  मरेगा?
है यह विधि के चपल हाथ में।।

थोड़े    आँसू     की     श्रद्धाँजलि, 
   उन्हें,   नहीं   हैं  शेष  आज  जो।
   जो   विपदा   में   बचे   सुरक्षित,
   पथ  उनका   भी,   मंगलमय हो।।

महाप्रलय के बाद, सृष्टि फिर
नूतन  उभरे,  नव-प्रभात  में।।
*