महालक्ष्मी अष्टकम्
का काव्य-भावानुवाद (क्रमशः ८)
-अरुण मिश्र.
श्वेताम्बर धारे हो देवी, नानालङ्कारों से भूषित।
जगत-मात हो, जगत-व्याप्त हो,महालक्ष्मी तुम्हें नमन है।।
*
(इतीन्द्रकृतं महालक्ष्म्यष्टकं सम्पूर्णम् )
मूल संस्कृत :
इन्द्र उवाच
श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कार् भूषिते।
जगतिस्थते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥
*
(इतीन्द्रकृतं महालक्ष्म्यष्टकं सम्पूर्णम् )
महालक्ष्मी अष्टकम्
का काव्य-भावानुवाद (क्रमशः ७)
-अरुण मिश्र.
तुम पद्मासन पर संस्थित हो, हे परब्रह्मस्वरूपिणि देवी!
हे परमेश्वरि ! हे जग-माता ! महालक्ष्मी तुम्हें नमन है।।७।।
*
मूल संस्कृत :
इन्द्र उवाच
पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि।
परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥७॥
*
महालक्ष्मी अष्टकम्
का काव्य-भावानुवाद (क्रमशः ६ )
-अरुण मिश्र.
स्थूल, सूक्ष्म हो, महारौद्र हो, महाशक्ति हो, महोदरा हो।
महापापहारिणि हे देवी ! महालक्ष्मी तुम्हें नमन है।।६।।
*
मूल संस्कृत :
इन्द्र उवाच
स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे।
महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥६॥
*
महालक्ष्मी अष्टकम्
का काव्य-भावानुवाद (क्रमशः ५ )
-अरुण मिश्र.
तुम आद्यन्त-रहित हो देवी, आदिशक्ति हो महेश्वरी हो।
प्रकट और सम्भूत योग से; महालक्ष्मी तुम्हें नमन है।।५।।
*
मूल संस्कृत :
इन्द्र उवाच
आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि।
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥५ ॥
*
महालक्ष्मी अष्टकम्
का काव्य-भावानुवाद (क्रमशः ४)
-अरुण मिश्र.
सिद्धि-बुद्धि सब देने वाली, भोग अरु मोक्ष प्रदायिनि! माता।
मन्त्र-पूत हे देवि सर्वदा ! महालक्ष्मी तुम्हें नमन है।।४ ।।
*
मूल संस्कृत :
इन्द्र उवाच
सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी।
मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥४॥
*
 |
| अक्टूबर में आम्र-मंजरी |
अक्टूबर में आम्र-मंजरी
-अरुण मिश्र
पेड़ आम का मेरे लॉन में,
यूँ तो आम आम जैसा है ।
पर इस में कुछ ख़ास बात है,
यह भी मनमौजी मुझ सा है ॥
वर्षा, ग्रीष्म, शरद सब में सम,
जब जी आये फगुआ, कजरी ।
नव-पल्लव हैं मध्य शरद में,
अक्टूबर में आम्र-मंजरी ॥
*
महालक्ष्मी अष्टकम्
का काव्य-भावानुवाद ( क्रमशः ३)
-अरुण मिश्र.
हे सर्वज्ञ ! सर्व-वरदे माँ ! सर्व दुष्ट-जन को भय देतीं।
सर्व दुःख हर लेतीं देवी; महालक्ष्मी तुम्हें नमन है।।३ ॥
*
मूल संस्कृत :
इन्द्र उवाच
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि।
सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥३॥
*