सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

फिर लगे खिलने नये ग़ुल.........

 ग़ज़ल


- अरुण मिश्र. 
       

  साज़िशन   पहले  तो  मेरे   बालो - पर  काटे  गये।
 फिर  दिखावे  के  लिये,   चुग्गे    बहुत   बाँटे  गये॥


 पा   के   गारंटी  कि,   मरने   पायेंगे   न   भूख  से।
 खोदते   मिट्‌टी   गये,   और   पेट   को   पाटे  गये॥


 हक  हमारा  है,  चुनें  हम  नाग  को  या  साँप  को।
 बारी - बारी  से   चुना    और    बारहा    काटे  गये॥


 फिर लगे खिलने नये ग़ुल फिर इलेक्शन आ गया।
 पंछियों  का  शोर  फिर,  गुलशन के  सन्नाटे गये॥


 जब  भी  आई  कौम  पर   क़ुर्बान   होने  की  घड़ी।
 रहनुमा  पीछे  हटे,  हम  ही   'अरुन'    छांटे   गये॥
                                     *

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

महा शिव रात्रि पर विशेष...

अथ शिवताण्डवस्तोत्रम्





रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्रम् का भावानुवाद...
        रावणकृत  यह  शिवताण्डव स्तोत्र  न केवल  भक्ति  एवं  भाव के  दृष्टि से अनुपम है
अपितु, काव्य की दृष्टि से भी अद्भुत है। इसकी लयात्मकता, छन्द- प्रवाह,  ध्वनि-सौष्ठव,
अलंकार-छटा,  रस-सृष्टि  एवं  चित्रात्मक संप्रेषणीयता  सब कुछ अत्यन्त आकर्षक एवं
मनोहारी  है।  यह  अप्रतिम  रचना  महामना  रावण  के   विनयशीलता,   पाण्डित्य  एवं
काव्य-लाघव का उत्कृष्ट उदाहरण है।
       अनन्य  भक्ति  की  गंगा,  प्रवहमान  स्वर-ध्वनि  की  यमुना  एवं  उत्कृष्ट काव्य की
सरस्वती की इस त्रिवेणी में अवगाहन के पुण्यलाभ के कृतज्ञतास्वरूप इसके भावानुवाद
का अकिंचन प्रयास किया है। आप भी पुण्यलाभ लें।
      भगवान शिव मेरा एवं समस्त लोक का कल्याण करें।

-अरुण मिश्र.

 ‘‘अथ शिवताण्डवस्तोत्रम्’’


जटा - वन - निःसृत,   गंगजल    के   प्रवाह   से-
पावन     गले,    विशाल     लम्बी     भुजंगमाल।
डम्-डम्-डम्, डम्-डम्-डम्, डमरू-स्वर पर प्रचंड,
करते   जो   तांडव,  वे   शिव  जी,  कल्याण  करें।।


जटा     के     कटाह    में,    वेगमयी    गंग    के,
चंचल   तरंग - लता   से   शोभित   है    मस्तक।
धग् - धग् - धग्  प्रज्ज्वलित पावक  ललाट पर;
बाल - चन्द्र - शेखर  में   प्रतिक्षण  रति  हो मेरी।।


गिरिजा के  विलास हेतु  धारित  शिरोभूषण  से,
भासित  दिशायें देख, प्रमुदित है   मन  जिनका।
जिनकी  सहज  कृपादृष्टि,  काटे  विपत्ति  कठिन,
ऐसे     दिगम्बर    में,    मन    मेरा    रमा    रहे।।


जटा   के   भुजंगो   के   फणों  के   मणियों   की-
पिंगल  प्रभा, दिग्वधुओं  के  मुख   कुंकुम  मले।
स्निग्ध,   मत्त - गज - चर्म - उत्तरीय  धारण  से,
भूतनाथ   शरण,    मन   अद्भुत     विनोद   लहे।।


इन्द्र   आदि   देवों   के   शीश   के   प्रसूनों   की- 
धूलि   से   विधूसर   है,  पाद-पीठिका   जिनकी।
शेष  नाग    की   माला   से     बाँधे  जटा - जूट,
चन्द्रमौलि,  चिरकालिक श्री  का  विस्तार  करें।।


ललाटाग्नि  ज्वाला  के   स्फुलिंग  से   जिसके-
दहे   कामदेव,   और   इन्द्र    नमन   करते   हैं।
चन्द्र की कलाओं से शोभित मस्तिष्क जटिल,
ऐसे  उन्नत  ललाट  शिव  को   मैं   भजता  हूँ ।।

भाल-पट्ट पर कराल,धग-धग-धग जले ज्वाल,
जिसकी    प्रचंडता    में    पंचशर    होम    हुये।
गौरी  के   कुचाग्रों  पर   पत्र - भंग - रचना   के-
एकमेव   शिल्पी,  हो  त्रिलोचन  में   रति  मेरी।।


रात्रि   अमावस्या   की,  घिरे   हों   नवीन  मेघ,
ऐसा   तम,  जिनके   है   कंठ  में   विराजमान।
चन्द्र  और   गंग  की   कलाओं को   शीश  धरे-
जगत्पिता  शिव,  मेरे   श्री  का   विस्तार  करें।।

खिले नील कमलों की,  श्याम वर्ण  हरिणों की,
श्यामलता से  चिह्नित, जिनकी  ग्रीवा  ललाम।
स्मर,पुर,भव, मख, गज, तम औरअन्धक का,
उच्छेदन  करते  हुये  शिव  को,  मैं   भजता हूँ।।


मंगलमयी   गौरी    के    कलामंजरी  का   जो-
चखते    रस - माधुर्य,   लोलुप    मधुप     बने।
स्मर,पुर,भव, मख, गज, तम और अन्धक के,
हैं जो  विनाशक, उन  शिव को  मैं   भजता  हूँ।।


भ्रमित    भुजंगों    के    तीव्र    निःश्वासों    से-
और भी  धधकती  है, भाल  की  कराल अग्नि।
धिमि-धिमि-धिमि मंगल मृदंगों की तुंग ध्वनि-
पर,  प्रचंड  ताण्डवरत्,  शिव जी की  जय होवे।।


पत्तों   की   शैय्या   और    सुन्दर  बिछौनों  में;
सर्प - मणिमाल,   और    पत्थर   में,  रत्नों  में।
तृण  हो  या  कमलनयन  तरुणी; राजा - प्रजा;
सब  में  सम  भाव, सदा  ऐसे  शिव  को  भजूँ।।


गंगा   तट  के   निकुंज - कोटर  में  रहते  हुये,
दुर्मति  से  मुक्त  और   शिर  पर अंजलि  बॉधे।
विह्वल  नेत्रों  में  भर  छवि  ललाम - भाल की,
जपता    शिवमंत्र,   कब    होऊँगा   सुखी   मैं।।


उत्तमोत्तम   इस   स्तुति  को   जो  नर  नित्य,
पढ़ता,   कहता   अथवा    करता   है   स्मरण।
पाता  शिव - भक्ति;  नहीं पाता  गति अन्यथा;
प्राणी   हो  मोहमुक्त,  शंकर   के   चिन्तन  से।।


शिव का कर  पूजन, जो पूजा की  समाप्ति पर,
पढ़ता   प्रदोष    में,   गीत   ये   दशानन   का।
रथ,    गज,    अश्व   से   युक्त,  उसे  अनुकूल,
स्थिर     श्री - सम्पदा,   शंभु    सदा   देते  हैं।।


 “इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
                             *
(गत वर्ष शिव रात्रि पर आडिओ क्लिप के साथ पूर्व प्रकाशित।)  


मूल संस्कृत पाठ  :   

रविवार, 19 फ़रवरी 2012

कोई ग़ैर तो नहीं है..............


-अरुण मिश्र.

 इक अजीब कश्मकश है, कुछ  बोलूँ या न बोलूँ।
 कोई  ग़ैर  तो नहीं है,  कि मैं  उसके  राज़ खोलूँ॥


 माना  कि,  उसने   मुझसे  ना बोलने की  ठानी।
 ये तो  और भी नादानी जो न मैं भी उससे बोलूँ॥


 उसका सवाल,  उस सा  कोई दूसरा भी  है क्या?
 किसी  दूसरे  को  देखूँ ,  तब तो   ज़ुबान  खोलूँ॥


 गुस्से  में   ग़र्चे  उसने,  रुख  से  नक़ाब  पलटा।
 अब  है  जो  बही  गंगा  तो  क्यूँ  न  हाथ धो लूँ॥


 हर  बार  'अरुन'  उसके  सम्मुख  यही  दशा है।
 क्या धड़कनें  गिनूँ मैं,  क्या  नब्ज़   को टटोलूँ॥
                                    *

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

तुम्हारा है हुनर ताजा सितम ईज़ाद कर लेना...........


ग़ज़ल 


-अरुण मिश्र   

कभी  भूले से ही  हमको,  कोई  दिन  याद  कर लेना। 
मेरी  बरबादियों पे  ख़ुश हो,  तो दिल शाद  कर लेना॥

ये तुम पे है,  हमारे हक़ में,  क्या  इन्साफ  करते हो। 
हमारे  हाथ  में  है,  रो  के   बस  फ़रियाद  कर लेना॥

हमारा  हौसला  है,  हर  जफ़ा  को   हॅस के  सह लेंगे। 
तुम्हारा  है  हुनर,  ताजा  सितम   ईज़ाद  कर  लेना॥

'अरुन' के मुँह पे ही,उनकी बुराई  यूँ  न कर ज़ालिम। 
वो  महफ़िल  से चले जायें,  तो उसके बाद कर लेना॥
                                      *

शनिवार, 28 जनवरी 2012

वसंत पंचमी पर विशेष......


हे ! इल्मो-फ़न की देवी.....

-अरुण मिश्र 

हे ! इल्मो-फ़न की देवी ।
शेरो - सुख़न  की   देवी ।।

ऐ  फ़िक्रो-तसव्वुर  की ।
औ' ज्ञान-धन की  देवी ।।

तहज़ीबो-तमद्दुन    की ।
चालो-चलन   की  देवी ।।

कर  पाक़  मन  हमारा ।
शफ्फाफ़ मन की  देवी ।।

है     हंस   की   सवारी ।
उजले वसन  की  देवी ।।

कमलों का तेरा आसन ।
गुल से  दहन की  देवी ।।

वीणा  से  गूँजे  हर  शै ।
धरती-गगन की,  देवी ।।

अर्बाबे-फ़न की ख़ातिर।
अव्वल वतन की देवी ।।

मन के  अँधेरे  हर  ले ।
रोशन ज़ेहन की  देवी ।।
               *

बुधवार, 25 जनवरी 2012

गणतंत्र दिवस २६ जनवरी पर विशेष

The daredevil stunts of motorcycle riders, during the full dress rehearsal for the Republic Day Parade-2011, in New Delhi on January 23, 2011
गणतंत्र  दिवस की शुभकामनायें 

















गर्वित है छब्बीस जनवरी...


-अरुण मिश्र 


ताने  लोकतंत्र की छतरी।
गर्वित है छब्बीस जनवरी।।


        नेता,  अभिनेता,  अपराधी।
       अफसर, मंत्री, उजली खादी।।
       बन्द  गाड़ियां  औ’  बन्दूकें।
       जनहित में कब अवसर चूकें??
       गॉधी के  अनगढ़ थे सपने।
       उन्हें  सुडौल  बनाया हमने।।
       काट-कूट  के, ठोंक-पीट  के।
       राम-राज  लाये  घसीट  के।।
       नायक  हों  चाहे  खलनायक।
      जन-गण-मन के हैं अधिनायक।।
      तुम जनता! इनकी जय बोलो।
      काम  ज़रूरी, फ़ारिग हो लो।।
      अज़ब लोक है, गज़ब तंत्र है।
      भैंस मुक्त, लाठी  स्वतंत्र है।।
      तंत्र, चीज यह मस्त-मस्त है।
      लोक भले ही लस्त-पस्त है।।


ताने  लोकतंत्र की छतरी।
हर्षित है छब्बीस जनवरी।।


       मुग्ध  लुटाये, शाशन-सत्ता।
       राशन, भाषण, साड़ी, भत्ता।।
       हर-हर-हर विकास की गंगा।
       नहा  रहा, हर  भूखा-नंगा।।
       खूब  करो   पैदा  औलादें।
       लोकतंत्र  की  लादी  लादें।।
       आजू-बाजू  हो जाओ  सब।
       दौड़ेगा विकास का रथ अब।।
       चाहे कितनी  हो  कठिनाई।
       जाति न मगर भूलना भाई!!
       बारी - बारी  से   बहुरेंगे।
       आज़ादी की  फसल  चरेंगे।।
       मूरख हैं, जो  समझें सारे।
       चारे   वाले,  हैं   बेचारे।।
       हौदी  पर  चारा  खायेंगे।
       बाहर  हुये  तो पगुरायेंगे।।


मेवा  चरे  राम की बकरी।
विहॅस रही छब्बीस जनवरी।।
                   *

सोमवार, 2 जनवरी 2012

हुई भोर !

(साहित्य अमृत, जनवरी' १२, के मुख पृष्ठ से साभार)



















-अरुण मिश्र.

हुई भोर। 
खग - रव  गूँजा; 
संजीवनि बही  पोर-पोर॥ 
        
          चिड़ियों     ने     जंगल  -  जंगल;         
          बाँटा ,           सूर्योदय   -   संदेश ।         
          मिटा    क्लेश ,  चंहुदिशि  मंगल;         
          अब न रहा, निशि-तम कुछ शेष ॥ 

दुख का 
लवलेश न रहा।    
सुख-सागर ले नई हिलोर॥
       
         दिनकर   ने     कर  बढ़ा     छुआ ,         
         तालों   का     एक - एक   कमल।         
         पहले,     अरुणाभ     कुछ   हुआ,         
         फिर,   हिरण्य-वर्ण    नील-जल॥ 

मन का 
दारिद्र्‌य, सब मिटा। 
स्वर्ण-वृष्टि , दृष्टि- ओर-छोर॥
        
          खग, मृग, जल-जंतु    सब  जगे,         
          जागा      मनुजों    का     संसार।         
          धरती  के   भाग्य  फिर  उजास,         
          नष्ट  सकल  कलुष ,  अन्धकार॥ 

मस्जिदों में 
फिर हुई अजान। 
मंदिरों  में  घंटियों- का शोर ॥
                            *