मंगलवार, 22 सितंबर 2015

लगता था जिसे हीरे की तरह........


             

लगता था जिसे हीरे की तरह........

-अरुण मिश्र


लगता था  जिसे  हीरे  की  तरह,  कोई एक फ़क़ीर  मेरे  जैसा। 
उसको भी  ख़ुशी की  ख़ातिर अब,  लगने है ज़रूरी  लगा पैसा।।

माना  कि,   अगर  पैसे  हों  तो,   ढेरों  सपने   सच  हो  सकते। 
पर  सोचो कि,  देख भी पाओगे,  क्या  सपना  वो  पहले जैसा।।

सपने ही तो सच्ची पूँजी हैं,  दौलत का क्या,  कल हो या न हो।
अपने  सपने   मत   खो  देना,   पाओगे   न   सरमाया   ऐसा।।

उसको भी हमारी बातों में, कुछ रस तो  मिलता होगा  'अरुन '। 
वर्ना  क्यूँ  सुना कर  शेर' मेरे,   वो  पूँछे  सभी से,  लगा कैसा ?? 

                                             *
 
 

LAWN MEN SHAAM KO GUNGUNATEY HUYE..


सोमवार, 21 सितंबर 2015

प्रिय कुशाग्र के जन्म दिवस पर आशीर्वाद एवं शुभकामनायें

 प्रिय कुशाग्र के जन्म दिवस पर विशेष 


नवांकुर...


-अरुण मिश्र
                                                                                                                                                                 
HAPPY BIRTH DAY KUSHAGRA




यह    नवांकुर    कुक्षि   से,   
रुचिरा ऋचा के जो उगा है |
मिश्र -कुल-वंशावली-मणि-
माल, नव-कौस्तुभ लगा है ||


          प्रज्ज्वलित   नव - दीप   सा,
          जो  आज  घर की  देहरी  पर |
          क्षितिज पर  कुल - व्योम के,
          चमका  नया  नक्षत्र  भास्वर ||


लहलहाई,    वंश   की    फिर-
बेल,    फूटी     नई     कोंपल|
दूध  से   आँचल   भरा;  कुल -
तरु,  फला  है  पूत  का  फल|| 


           पुष्प    जो    अभिनव   खिला,
            परिवार-बगिया में विहंस कर |
            गोद  दादी   के,  पितामह  के, 
            ह्रदय    में ,   मोद    दे     भर ||


हो 'कुशाग्र', कुशाग्र-मेधायुत,
अपरिमित    बुद्धि - बल    हो|
मंगलम, मधुरं,  शुभम, प्रिय,
प्रोज्ज्वल,  प्रांजल,  प्रबल हो||

                      *
यह कविता सुनने के लिए दिए गए ऑडियो क्लिप का
प्ले बटन क्लिककरें
       

                             
  
Powered by Podbean.com

(पूर्व  प्रकाशित )
    

शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

कान्हा ! श्याम ! मुरारी !

जन्माष्टमी पर सब के लिए मंगलकामनाएं


कान्हा ! श्याम ! मुरारी !











कान्हा ! श्याम ! मुरारी !

-अरुण मिश्र


हे! मोहन, राधा।
बसहु चित्त, छवि जुगल सदा;
हरहु सकल बाधा।।


हे! गुपाल गिरिधारी।
बिगरी कौन बनावै तुम बिन;
राखो लाज हमारी।।


हे! नटवर नागर।
इक तुम्हरो भरोस हिय माँही;
तारो भव सागर।।


कान्हा! श्याम! मुरारी!
गोविंद! माधव! नंद के लाला!
टारो विपति हमारी।।


साँवले, सलोने श्याम!
सोलह कलाओं से पूर्ण; पूर्णकाम।
स्वीकारो कोटिशः प्रणाम।।


                *

(तीन पदों की कुछ छोटी-छोटी तुकांत रचनाएँ, 
पदवार  क्रमशः  तीन, पाँच एवं तीन के शब्द-विधान में। )
 
 

 

शनिवार, 1 अगस्त 2015

तुम भी तो दोस्त हो....फ्रेंडशिप डे, रविवार, 02, अगस्त, 2015.



फ्रेंडशिप डे, रविवार, 02, अगस्त, 2015.

Image result for friendship day images


तुम भी तो दोस्त हो....

-अरुण मिश्र


तुम भी तो दोस्त हो;

तुम को भी पता ही होगा;

बहुत दिनों से उदासी किये घर बैठी है।

जि़न्दगी रूठी हुई लगती है माशूक़ा सी।

चहचहे गुम हैं, बग़ीचे गुम-सुम।

दिल सुकूँ ढूँढ़ता है माज़ी में;

ऐसे में दोस्त ! याद आते तुम।।


जब भी याद आती है,

दिल से ये निकलती है दुआ,

मेरी बदहाली मुझी तक सिमटे।

तुम हो जिस ओर
 
वहाँ हर तरफ़ ख़ुशहाली हो।

औ’ कभी तुमको भी

याद आये मेरी, ऐसे ही।। 


तुम भी तो दोस्त हो।।

                   *
Image result for friendship day images