शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

https://youtu.be/CMyjLBVII_s?si=1AqGd7s8FJuM39cb

जीवन संगिनी को समर्पित कर रहा हूँ, जो दो दिन पहले हम सब को छोड़ गईं। 

-अरुण मिश्र. 

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं.../ क़तील शिफ़ाई / गायन : विदुषी शोभा गुर्टू

https://youtu.be/S9q1jgG0qI0  


गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं

शम्अ' जिस आग में जलती है नुमाइश के लिए
हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं

बच निकलते हैं अगर आतिश-ए-सय्याल से हम
शोला-ए-आरिज़-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं

ख़ुद-नुमाई तो नहीं शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा
जिन को जलना हो वो आराम से जल जाते हैं

रब्त-ए-बाहम पे हमें क्या न कहेंगे दुश्मन
आश्ना जब तिरे पैग़ाम से जल जाते हैं

जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं

अर्धनारीनटेश्वर स्तोत्र / आदि शंकराचार्य कृत / गायन : कौशिकी चक्रवर्ती / संदीप नारायण

https://youtu.be/8fyGJvG-WhE 


अथ अर्धनारीनटेश्वर स्तोत्र हिन्दी अर्थ सहित

चाम्पेयगौरार्धशरीरकायै कर्पूरगौरार्धशरीरकाय ।
धम्मिल्लकायै च जटाधराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।१।।

आधे शरीर में चम्पापुष्पों-सी गोरी पार्वतीजी हैं और आधे शरीर में कर्पूर के समान गोरे भगवान शंकरजी सुशोभित हो रहे हैं । भगवान शंकर जटा धारण किये हैं और पार्वतीजी के सुन्दर केशपाश सुशोभित हो रहे हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

कस्तूरिकाकुंकुमचर्चितायै चितारज:पुंजविचर्चिताय ।
कृतस्मरायै विकृतस्मराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।२।।

पार्वतीजी के शरीर में कस्तूरी और कुंकुम का लेप लगा है और भगवान शंकर के शरीर में चिता-भस्म का पुंज लगा है । पार्वतीजी कामदेव को जिलाने वाली हैं और भगवान शंकर उसे नष्ट करने वाले हैं, ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

चलत्क्वणत्कंकणनूपुरायै पादाब्जराजत्फणीनूपुराय ।
हेमांगदायै भुजगांगदाय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।३।।

भगवती पार्वती के हाथों में कंकण और पैरों में नूपुरों की ध्वनि हो रही है तथा भगवान शंकर के हाथों और पैरों में सर्पों के फुफकार की ध्वनि हो रही है । पार्वतीजी की भुजाओं में बाजूबन्द सुशोभित हो रहे हैं और भगवान शंकर की भुजाओं में सर्प सुशोभित हो रहे हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

विशालनीलोत्पललोचनायै विकासिपंकेरुहलोचनाय ।
समेक्षणायै विषमेक्षणाय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।४।।

पार्वतीजी के नेत्र प्रफुल्लित नीले कमल के समान सुन्दर हैं और भगवान शंकर के नेत्र विकसित कमल के समान हैं । पार्वतीजी के दो सुन्दर नेत्र हैं और भगवान शंकर के (सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि) तीन नेत्र हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

मन्दारमालाकलितालकायै कपालमालांकितकन्धराय ।
दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।५।।

पार्वतीजी के केशपाशों में मन्दार-पुष्पों की माला सुशोभित है और भगवान शंकर के गले में मुण्डों की माला सुशोभित हो रही है । पार्वतीजी के वस्त्र अति दिव्य हैं और भगवान शंकर दिगम्बर रूप में सुशोभित हो रहे हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

अम्भोधरश्यामलकुन्तलायै तडित्प्रभाताम्रजटाधराय ।
निरीश्वरायै निखिलेश्वराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।६।।

पार्वतीजी के केश जल से भरे काले मेघ के समान सुन्दर हैं और भगवान शंकर की जटा विद्युत्प्रभा के समान कुछ लालिमा लिए हुए चमकती दीखती है । पार्वतीजी परम स्वतन्त्र हैं अर्थात् उनसे बढ़कर कोई नहीं है और भगवान शंकर सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

प्रपंचसृष्ट्युन्मुखलास्यकायै समस्तसंहारकताण्डवाय ।
जगज्जनन्यैजगदेकपित्रे नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।७।।

भगवती पार्वती लास्य नृत्य करती हैं और उससे जगत की रचना होती है और भगवान शंकर का नृत्य सृष्टिप्रपंच का संहारक है । पार्वतीजी संसार की माता और भगवान शंकर संसार के एकमात्र पिता हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

प्रदीप्तरत्नोज्ज्वलकुण्डलायै स्फुरन्महापन्नगभूषणाय ।
शिवान्वितायै च शिवान्विताय नम: शिवायै च नम: शिवाय।।८।।

पार्वतीजी प्रदीप्त रत्नों के उज्जवल कुण्डल धारण किए हुई हैं और भगवान शंकर फूत्कार करते हुए महान सर्पों का आभूषण धारण किए हैं । भगवती पार्वतीजी भगवान शंकर की और भगवान शंकर भगवती पार्वती की शक्ति से समन्वित हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

स्तुति का फल

एतत् पठेदष्टकमिष्टदं यो भक्त्या स मान्यो भुवि दीर्घजीवी ।
प्राप्नोति सौभाग्यमनन्तकालं भूयात् सदा तस्य समस्तसिद्धि:।।

आठ श्लोकों का यह स्तोत्र अभीष्ट सिद्धि करने वाला हैं । जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, वह समस्त संसार में सम्मानित होता है और दीर्घजीवी बनता है, वह अनन्त काल के लिए सौभाग्य व समस्त सिद्धियों को प्राप्त करता है।

।। इति आदिशंकराचार्य विरचित अर्धनारीनटेश्वरस्तोत्रम् सम्पूर्णम्।।

शनिवार, 26 सितंबर 2026

विशमक्कारा कन्नन.../ ऊथुक्काडु वेंकट सुब्बैयर कृति

https://youtu.be/BW9cokdvOGE  


*विशमक्कारा* तमिल भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है बहुत अधिक शरारती, नटखट या उपद्रवी।
*कन्नन* : तमिल में भगवान श्रीकृष्ण का नाम (कृष्ण) है। 
यह प्रसिद्ध कर्नाटक संगीत का एक लोकप्रिय पद/गीत है जिसे ऊथुक्काडू वेंकट सुब्ब अय्यर ने रचा है। इस गीत में बचपन में भगवान कृष्ण द्वारा की जाने वाली विभिन्न शरारतों और लीलाओं का वर्णन किया गया है।

*विशमक्कारा कन्नन*
*ऊथुक्काडु वेंकट सुब्बैयर कृति*
*अनुवाद : पी.आर.रामचंदर*

पल्लवी 
विशमक्कारा कन्नन, पोलाधा, विशमक्कारा कन्नन 
अनुपल्लवी 
वेदिक्कयै पट्टू पड़ी विधा विधामय आट्टम आदि, 
नाझिक्कोरु लीलै सेय्यूम, नंदगोपाल कृष्णन। 

चरणम् १.
नीला मेघम पोल इरुप्पन-पडिनाले, 
नेन्जिल वंधु कुडियिरुप्पन, 
कोला पुल्लंगुझल ऊधी गोपीकलाई कल्लम आदि, 
कोंजुम पोधु, कोंजम पोला वेन्नई ठाडी येंद्रु अतामुदन,

 चरणम् २.
पिन्नालाई पिन्नादी इझुप्पन-येथो, 
पेसी पेसी जड़ाई कट्टी अझिप्पन, 
येन्नाथुकु पिन्नलाई नी इझुथाई येंद्रल, 
कन्नझागु वेंडी येंदन करुथाई यिझुथथु येनबन 

चरणम् ३.
पकाथु वीतु पेनाई अज़हिप्पन, मुगारी रागम, 
पाडा सोल्ली वम्बुक्किज़प्पन, 
येनक्कु अथु थेरियादेंद्राल- मुगारी रागमा, 
येनाक्कथु थेरियाथु एंड्राल, नेक्कुरुगी किलि विट्टू, 
अवल विक्की, विक्की अजहुम पोथु, 
इथु ​​थानाडी मुगारी येनबन। 

चरणम् ४. 
वेन्नई पनाई मूडा कूडाथु, ओरिलुल्ला, 
वेन्नई पनाई मूडा कूडाथु , 
इवान वन्थु विझुंगिनालुम केतका कूडाथु , 
इवान अम्मा कित्ता सोल्ला कूडाथु, 
सोल्ली विट्टल अट्टहासम थांगा मुदियाथु। 
सुम्मा ओरु पेचुक्कम थिरुडन येंद्रु सोलि विट्टल, 
अम्मा , पट्टी, अथाई अथानायुम थिरुडन येनबान 

*हिन्दी अनुवाद :*

पल्लवी :
शरारती कृष्ण, भयानक, शरारती कृष्ण। 

अनुपल्लवी : 
हास्य गीत गाती, तरह-तरह से नृत्य करती, 
नंदगोपाल के पुत्र कृष्ण, 
हर आधे घंटे में एक नाटक करते।
 
चरणम १. 
वह नीले बादल के समान होगा—और यदि वह गाए, 
तो वह आकर हमारे हृदय में बस जाएगा। 
और जब वह अपनी बांसुरी बजाते हुए और 
झूठी प्रेम-प्रसंग की बातें करते हुए गोपियों से पूछेगा, 
“हे, मुझे थोड़ा सा मक्खन दो।” 

चरणम् २. 
वह पीछे से उनकी चोटी खींचेगा और 
मीठी-मीठी बातें करेगा और 
धीरे-धीरे उनकी चोटी खोलेगा। 
और यदि वे पूछें, “आपने मेरी चोटी क्यों खींची?”, 
तो वह कहेगा, “मेरे मन ने इसे और सुंदर आँखें 
पाने के लिए खींचा।” 

चरणम् ३. 
वह पड़ोस के घर की लड़की को बुलाएगा और 
उससे मुकारी राग गाने को कहेगा और 
उसे बेवजह परेशान करेगा। 
और मान लीजिए वह कहे, “मुझे नहीं पता, 
क्या यह मुकारी राग है, मुझे नहीं पता”, 
तो वह दया का नाटक करते हुए उसे चुटकी काटेगा। 
और जब वह बेकाबू होकर रोने लगेगी, 
तो वह कहेगा, “यह मुकारी राग है।” 

चरणम् ४. 
उन्होंने कहा था कि “मक्खन का पात्र बंद नहीं किया जाना चाहिए। शहर के सभी मक्खन के पात्र बंद नहीं किए जाने चाहिए।”

बुधवार, 23 सितंबर 2026

तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ.../ राम धारी सिंह दिनकर

https://youtu.be/mq6PzpD3tTU  


झूमें जहर चरण के नीचे मैं उमंग में गाऊँ.
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


यह बाँसुरी बजी माया के मुकुलित आकुंचन में,
यह बाँसुरी बजी अविनाशी के संदेह गहन में
अस्तित्वों के अनस्तित्व में,महाशांति के तल में,
यह बाँसुरी बजी शून्यासन की समाधि निश्चल में।
कम्पहीन तेरे समुद्र में जीवन-लहर उठाऊँ
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


अक्षयवट पर बजी बाँसुरी,गगन मगन लहराया
दल पर विधि को लिए जलधि में नाभि-कमल उग आया
जन्मी नव चेतना, सिहरने लगे तत्व चल-दल से,
स्वर का ले अवलम्ब भूमि निकली प्लावन के जल से।
अपने आर्द्र वसन की वसुधा को फिर याद दिलाऊँ.
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


फूली सृष्टि नाद-बंधन पर, अब तक फूल रही है,
वंशी के स्वर के धागे में धरती झूल रही है।
आदि-छोर पर जो स्वर फूँका,दौड़ा अंत तलक है,
तार-तार में गूँज गीत की,कण-कण-बीच झलक है।
आलापों पर उठा जगत को भर-भर पेंग झूलाऊँ.
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


जगमग ओस-बिंदु गुंथ जाते सांसो के तारों में,
गीत बदल जाते अनजाने मोती के हारों में।
जब-जब उठता नाद मेघ,मंडलाकार घिरते हैं,
आस-पास वंशी के गीले इंद्रधनुष तिरते है।
बाँधू मेघ कहाँ सुरधनु पर? सुरधनु कहाँ सजाऊँ?
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


उड़े नाद के जो कण ऊपर वे बन गए सितारे,
नीचे जो रह गए, कहीं है फूल, कहीं अंगारे।
भीगे अधर कभी वंशी के शीतल गंगा जल से,
कभी प्राण तक झुलस उठे हैं इसके हालाहल से।
शीतलता पीकर प्रदाह से कैसे ह्रदय चुराऊँ?
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


इस वंशी के मधुर तान पर माया डोल चुकी है
पटावरण कर दूर भेद अंतर का खोल चुकी है।
झूम चुकी है प्रकृति चांदनी में मादक गानों पर,
नचा चुका है महानर्तकी को इसकी तानों पर।
विषवर्षी पर अमृतवर्षिणी का जादू आजमाऊँ,
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


यह बाँसुरी बजी, मधु के सोते फूटे मधुबन में,
यह बाँसुरी बजी, हरियाली दौड़ गई कानन में।
यह बाँसुरी बजी, प्रत्यागत हुए विहंग गगन से,
यह बाँसुरी बजी, सरक विधु चरने लगा गगन से।
अमृत सरोवर में धो-धो तेरा भी जहर बहाऊँ।
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


यह बाँसुरी बजी, पनघट पर कालिंदी के तट में,
यह बाँसुरी बजी, मुरदों के आसन पर मरघट में।
बजी निशा के बीच आलुलायित केशों के तम में,
बजी सूर्य के साथ यही बाँसुरी रक्त-कर्दम में।
कालिय दह में मिले हुए विष को पीयूष बनाऊँ.
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


फूँक-फूँक विष लपट, उगल जितना हो जहर ह्रदय में,
वंशी यह निर्गरल बजेगी सदा शांति की लय में।
पहचाने किस तरह भला तू निज विष का मतवाला?
मैं हूँ साँपों की पीठों पर कुसुम लादने वाला।
विष दह से चल निकल फूल से तेरा अंग सजाऊँ
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


ओ शंका के व्याल! देख मत मेरे श्याम वदन को,
चक्षुःश्रवा! श्रवण कर वंशी के भीतर के स्वर को।
जिसने दिया तुझको विष उसने मुझको गान दिया है,
ईर्ष्या तुझे, उसी ने मुझको भी अभिमान दिया है।
इस आशीष के लिए भाग्य पर क्यों न अधिक इतराऊँ?
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


विषधारी! मत डोल, कि मेरा आसन बहुत कड़ा है,
कृष्ण आज लघुता में भी साँपों से बहुत बड़ा है।
आया हूँ बाँसुरी-बीच उद्धार लिए जन-गण का,
फन पर तेरे खड़ा हुआ हूँ भार लिए त्रिभुवन का।
बढ़ा, बढ़ा नासिका रंध्र में मुक्ति-सूत्र पहनाऊँ
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

कालभैरव अष्टकम्.../ आदि शंकराचार्य विरचित / गायन : माधवी मधुकर झा

https://youtu.be/BEPZqeBSeig  



देवराज सेव्यमान पावनाङ्घ्रि पङ्कजं
व्यालयज्ञ सूत्रमिन्दु शेखरं कृपाकरम् 
नारदादि योगिवृन्द वन्दितं दिगंबरं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥ १॥ 


भानुकोटि भास्वरं भवाब्धितारकं परं
नीलकण्ठम् ईप्सितार्थ दायकं त्रिलोचनम्।
कालकालम् अंबुजाक्षम् अक्षशूलम् अक्षरं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥२॥ 

शूलटङ्क पाशदण्ड पाणिमादि कारणं
श्यामकायम् आदिदेवम् अक्षरं निरामयम्।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥३॥ 

भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं
भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्।
विनिक्वणन् मनोज्ञहेमकिङ्किणी लसत्कटिं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥४॥ 

धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं
कर्मपाश मोचकं सुशर्मदायकं विभुम्।
स्वर्णवर्णशेषपाश शोभिताङ्गमण्डलं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ५॥ 

रत्नपादुका प्रभाभिराम पादयुग्मकं
नित्यम् अद्वितीयम् इष्टदैवतं निरञ्जनम्।
मृत्युदर्पनाशनं कराळदंष्ट्रमोक्षणं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥६॥ 

अट्टहास भिन्नपद्मजाण्डकोश सन्ततिं
दृष्टिपातनष्टपाप जालमुग्रशासनम्।
अष्टसिद्धिदायकं कपाल मालिकन्धरं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥७॥ 

भूतसङ्घनायकं विशालकीर्तिदायकं
काशिवासलोक पुण्यपापशोधकं विभुम्।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥८॥ 

कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं
ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम्।
शोक मोह दैन्य लोभ कोप ताप नाशनं
ते प्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रि सन्निधिं ध्रुवम् ॥९॥ 

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं कालभैरवाष्टकं संपूर्णम्॥

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

बन्दउं चरण सरोज तिहारे.../ सन्त सूरदास / गायन : स्वर्णिमा गोसाईं

https://youtu.be/QUhyxQ5ij-c  


बंदौ चरन-सरोज तिहारे ।
सुंदर स्याम कमल-दल-लोचन, ललित त्रिभंगी प्रान-पियारे।

जे पद-पदुम सदा सिव के धन, सिंधु-सुता उर तैं नहिं टारे।
जे पद-पदुम तात-रिस-त्रासत, मन-बच-क्रम प्रहलाद सँभारे ।।

जे पद-पदुम-परस जल-पावन-सुरसरि-दरस कटत अघ भारे।
जे पद-पदुम-परस रिषि-पतिनी, बलि, नृग, ब्याध, पतित बहु तारे।।

जे पद-पदुम रमत बृंदाबन अहि-सिर धरि,  अगनित रिपु मारे।
जे पद-पदुम परसि ब्रज-भामिनी सरबस दै, सुत-सदन बिसारे ।। 

जे पद-पदुम रमत पांडव-दल, 
दूत भए, सब काज सँवारे।
सूरदास तेई पद-पंकज, त्रिबिध-ताप-दुख-हरन हमारे ।।


भावार्थ :

प्राणप्यारे त्रिभंगसुन्दर कमलदललोचन श्यामसुन्दर! 
मैं आपके चरणकमलों की वन्दना करता हूँ। 
(प्रभो! आपके) जो चरणकमल भगवान् शंकर के 
सदा (परम) धन हैं, (जिन्हें) सन्धुसुता लक्ष्मी जी अपने 
हृदय से कभी दूर नहीं करतीं, (अपने) पिता हिरण्यकशिपु 
के क्रोध से कष्ट पाते हुए भी प्रह्लाद जी ने जिन पादपद्मों को मन, वचन और कर्म से सँभाल रखा (घोर कष्ट में भी जिनको 
वे भूले नहीं), जिन पादकमलों के स्पर्श से पवित्र हुआ जल (पादोदक) ही भगवती गंगा हैं, जिनका दर्शन करने से ही महान् पाप भी नष्ट हो जाते हैं, जिन चरणों का स्पर्श करके ऋषि पत्नी अहल्या तथा दैत्यराज बलि, राजा नृग, व्याध एवं (दूसरे भी) बहुत से पतित मुक्त हो गये, जो चरणकमल वृन्दावन में विचरण करते थे, (जिन्हें) कालियनाग के सिर पर (आपने) धरा और (जिन चरणों से व्रज में चलकर) अगणित शत्रुओं का संहार किया, जिन चरणकमलों का स्पर्श पाकर व्रजगोपियों ने (उनपर अपना) सर्वस्व न्योछावर कर दिया 
तथा घर, पुत्रादिकों को भी विस्मृत हो गयीं, जिन चरणकमलों से (आप) पाण्डवदल में घूमते रहे, उनके दूत बने तथा उनके सब काम बनाये, सूरदास जी कहते हैं कि (हे श्यामसुन्दर!) आपके वही चरणकमल हमारे (आधिभौतिक, आधिदैविक 
एवं आध्यात्मिक) तीनों तापों को तथा समस्त दुःखों को हरण करने वाले हैं।

सोमवार, 21 सितंबर 2026

मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौं.../ मधुश्रावणी / मैथिल लोक गीत

https://youtu.be/4kUcv_5QP3I  


मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौं,
नहि ऐला बालम हमार हे!
मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौं... 
नहि ऐला बालम हमार हे!

सासु बेदर्दी दरदो ने जानल,
ने देलनि भार पठाय हे !
मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौं... 

गोतनी बेदर्दी दरदो ने जानल, 
ने देलनि गौर बनाय हे !
मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौं... 

ननदी बेदर्दी दरदो ने जानल 
ने देलनि डाली सजाय हे !
मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौं... 

ससुर जी निदर्दा दरदो ने जानल 
नहिं देलन पानी पठाय हे !
मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौ...

रविवार, 20 सितंबर 2026

बीत गया हंगाम-ए-क़यामत रोज़-ए-क़यामत आज भी है.../ शकील बदायूँनी

https://youtu.be/jxJJ_DoaM-8  


बीत गया हंगाम-ए-क़यामत रोज़-ए-क़यामत आज भी है
तर्क-ए-तअल्लुक़ काम न आया उन से मोहब्बत आज भी है

सख़्त सही हस्ती के मराहिल-ए-इश्क़ में राहत आज भी है
ऐ ग़म-ए-जानाँ हो न गुरेज़ाँ तेरी ज़रूरत आज भी है

गुलशन-ए-हुस्न-ए-यार में करते हैं जो तलाश-ए-कैफ़-ओ-सुकूँ
लाख है बरहम नज़्म-ए-दो-आलम ज़ुल्फ़ में निकहत आज भी है

नूर-ए-सहर है जान-ए-तसव्वुर ज़ुल्मत-ए-शब से कौन डरे
लाख बनी है ज़ीस्त जहन्नम सामने जन्नत आज भी है

सुब्ह-ए-बहार आई थी ले कर रुत भी नई शाख़ें भी नई
ग़ुंचा-ओ-गुल से प्यार है लेकिन शाख़ से नफ़रत आज भी है

अर्ज़-ए-तमन्ना कर के गँवाया हम ने भरम ख़ुद्दारी का
हो गई गो तकमील-ए-तमन्ना दिल को नदामत आज भी है

कर के सितम की पर्दा-पोशी हम ने उन्हें बे-ऐब किया
वर्ना 'शकील' अपने होंटों पर हर्फ़-ए-शिकायत आज भी है

शनिवार, 19 सितंबर 2026

लक्ष्मी रावे मा इन्टिकी...(लक्ष्मी मेरे घर पधारो !) / गायन : जे. जया हंसिनी / भाषा : तेलगु

https://youtu.be/vg6Roz65nqY  


लक्ष्मि रावे मा इंटिकि वरलक्ष्मि रावे मा इंटिकि
क्षीराब्धि पुत्रि वरलक्ष्मि रावे मा इंटिकि

लक्ष्मि रावे मा इंटिकि राजितमुग नॆलकॊन्न
सूक्ष्ममुग मोक्षमिच्चु सुंदरि बृंदावन धारि
कुंकुम पच्च कस्तूरि कोरिकतोनु गोरोजनमु
जाजि पुव्वु जलजलोचिनि मुदमुतोन अर्पिंतूमु

चल्लनि गंधमु चंदनमुतो साम्राणि धूपमु
माता नीकु प्रीतिग प्रख्यातीग समर्पिंतुनम्म
पसुपु अक्षतलु परिमळ द्रव्यं
पंच बिल्वमुलु पूर्ण कलशमु
माता नीकु प्रीतिग प्रख्यातीग समर्पिंतुनम्म

गुंडु मल्लॆ मॊगलि पूलु
दंडिग चामंति पूलु मेलैन पारिजातमु
माता नीकु प्रीतिग प्रख्यातीग समर्पिंतुनम्म
अंदमुग जरि अंचु चीर कुंदनमु पच्चनि रविक
मॊगलि पुव्वुल जडने अल्लि जडगुच्चुलनु कट्टेनम्म

माता नीकु मुदमुतो मेमु चेतुमम्म चक्कनि पूज
अंदमुग अडवि पंड्लु कदलि पंड्लु रेगु पंड्लु
मेलैन दानिम्म पंड्लु घनमुगा कर्जुर पंड्लु
पंडु वॆन्नॆलतो नीकु पद्मासिनि ने पूजिंप

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ.../अहमद फ़राज़

https://youtu.be/EuaUphyh9Pw 

अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ
याद क्या तुझ को दिलाएँ तिरा पैमाँ जानाँ


यूँही मौसम की अदा देख के याद आया है
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इंसाँ जानाँ


ज़िंदगी तेरी अता थी सो तिरे नाम की है
हम ने जैसे भी बसर की तिरा एहसाँ जानाँ


दिल ये कहता है कि शायद है फ़सुर्दा तू भी
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादाँ जानाँ


अव्वल अव्वल की मोहब्बत के नशे याद तो कर
बे-पिए भी तिरा चेहरा था गुलिस्ताँ जानाँ


आख़िर आख़िर तो ये आलम है कि अब होश नहीं
रग-ए-मीना सुलग उट्ठी कि रग-ए-जाँ जानाँ


मुद्दतों से यही आलम न तवक़्क़ो न उमीद
दिल पुकारे ही चला जाता है जानाँ जानाँ


हम भी क्या सादा थे हम ने भी समझ रक्खा था
ग़म-ए-दौराँ से जुदा है ग़म-ए-जानाँ जानाँ


अब के कुछ ऐसी सजी महफ़िल-ए-याराँ जानाँ
सर-ब-ज़ानू है कोई सर-ब-गरेबाँ जानाँ


हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है
हर कोई अपने ही साए से हिरासाँ जानाँ


जिस को देखो वही ज़ंजीर-ब-पा लगता है
शहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िंदाँ जानाँ


अब तिरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आए
और से और हुए दर्द के उनवाँ जानाँ


हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जानाँ


होश आया तो सभी ख़्वाब थे रेज़ा रेज़ा
जैसे उड़ते हुए औराक़-ए-परेशाँ जानाँ

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

कविता में चतुरंग...

https://youtube.com/shorts/h9UPcotlC10  

श्लोक

सेना लीलीलीना नाली 
लीनाना नानालीलीली। 
नालीनालीले नालीना 
लीलीली नानानानाली ॥ 

यह नौवीं शताब्दी के कश्मीरी आचार्य रुद्रट द्वारा रचित,
काव्यालङ्कार ग्रंथ का एक प्रसिद्ध श्लोक है, जिसे
शतरंज के इतिहास में 'घोड़े की चाल' (Knight's Tour) 
का सबसे पुराना भारतीय उदाहरण माना जाता है।

बुधवार, 16 सितंबर 2026

श्री राधा कृपा-कटाक्ष स्तोत्रं...

https://youtu.be/9hWbP  

(श्लोक – १)

मुनीन्दवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणी,
प्रसन्नवक्त्रपंकजे निकंजभूविलासिनी।
व्रजेन्दभानुनन्दिनी व्रजेन्द सूनुसंगते,
कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (१)

भावार्थ : समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं, आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नचित्त प्रफुल्लित मुख कमल वाली हैं, आप धरा पर निकुंज में विलास करने वाली हैं। आप राजा वृषभानु की राजकुमारी हैं, आप ब्रजराज नन्द किशोर श्री कृष्ण की चिरसंगिनी है, हे जगज्जननी श्रीराधे माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (१)

(श्लोक – २)

अशोकवृक्ष वल्लरी वितानमण्डपस्थिते,
प्रवालज्वालपल्लव प्रभारूणाङि्घ् कोमले।
वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये,
कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (२)

भावार्थ : आप अशोक की वृक्ष-लताओं से बने हुए मंदिर में विराजमान हैं, आप सूर्य की प्रचंड अग्नि की लाल ज्वालाओं के समान कोमल चरणों वाली हैं, आप भक्तों को अभीष्ट वरदान, अभय दान देने के लिए सदैव उत्सुक रहने वाली हैं। आप के हाथ सुन्दर कमल के समान हैं, आप अपार ऐश्वर्य की भंङार स्वामिनी हैं, हे सर्वेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (२)

(श्लोक – ३)

अनंगरंगमंगल प्रसंगभंगुरभ्रुवां,
सुविभ्रम ससम्भ्रम दृगन्तबाणपातनैः।
निरन्तरं वशीकृत प्रतीतनन्दनन्दने,
कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (३)

भावार्थ : रास क्रीड़ा के रंगमंच पर मंगलमय प्रसंग में आप अपनी बाँकी भृकुटी से आश्चर्य उत्पन्न करते हुए सहज कटाक्ष रूपी वाणों की वर्षा करती रहती हैं। आप श्री नन्दकिशोर को निरंतर अपने बस में किये रहती हैं, हे जगज्जननी वृन्दावनेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (३)

(श्लोक – ४)

तड़ित्सुवणचम्पक प्रदीप्तगौरविगहे,
मुखप्रभापरास्त-कोटिशारदेन्दुमण्ङले।
विचित्रचित्र-संचरच्चकोरशावलोचने,
कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (४)

भावार्थ : आप बिजली के सदृश, स्वर्ण तथा चम्पा के पुष्प के समान सुनहरी आभा वाली हैं, आप दीपक के समान गोरे अंगों वाली हैं, आप अपने मुखारविंद की चाँदनी से शरद पूर्णिमा के करोड़ों चन्द्रमा को लजाने वाली हैं। आपके नेत्र पल-पल में विचित्र चित्रों की छटा दिखाने वाले चंचल चकोर शिशु के समान हैं, हे वृन्दावनेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (४)

(श्लोक – ५)

मदोन्मदातियौवने प्रमोद मानमणि्ते,
प्रियानुरागरंजिते कलाविलासपणि्डते।
अनन्यधन्यकुंजराज कामकेलिकोविदे
कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (५)

भावार्थ : आप अपने चिर-यौवन के आनन्द के मग्न रहने वाली है, आनंद से पूरित मन ही आपका सर्वोत्तम आभूषण है, आप अपने प्रियतम के अनुराग में रंगी हुई विलासपूर्ण कला पारंगत हैं। आप अपने अनन्य भक्त गोपिकाओं से धन्य हुए निकुंज-राज के प्रेम क्रीड़ा की विधा में भी प्रवीण हैं, हे निकुँजेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (५)

(श्लोक – ६)

अशेषहावभाव धीरहीर हार भूषिते,
प्रभूतशातकुम्भकुम्भ कुमि्भकुम्भसुस्तनी।
प्रशस्तमंदहास्यचूणपूणसौख्यसागरे,
कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (६)

भावार्थ : आप संपूर्ण हाव-भाव रूपी श्रृंगारों से परिपूर्ण हैं, आप धीरज रूपी हीरों के हारों से विभूषित हैं, आप शुद्ध स्वर्ण के कलशों के समान अंगो वाली है, आपके पयोंधर स्वर्ण कलशों के समान मनोहर हैं। आपकी मंद-मंद मधुर मुस्कान सागर के समान आनन्द प्रदान करने वाली है, हे कृष्णप्रिया माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (६)

(श्लोक – ७)

मृणालबालवल्लरी तरंगरंगदोलते,
लतागलास्यलोलनील लोचनावलोकने।
ललल्लुलमि्लन्मनोज्ञ मुग्ध मोहनाश्रये,
कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (७)

भावार्थ : जल की लहरों से कम्पित हुए नूतन कमल-नाल के समान आपकी सुकोमल भुजाएँ हैं, आपके नीले चंचल नेत्र पवन के झोंकों से नाचते हुए लता के अग्र-भाग के समान अवलोकन करने वाले हैं। सभी के मन को ललचाने वाले, लुभाने वाले मोहन भी आप पर मुग्ध होकर आपके मिलन के लिये आतुर रहते हैं ऎसे मनमोहन को आप आश्रय देने वाली हैं, हे वृषभानुनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (७)

(श्लोक – ८)

सुवर्ण्मालिकांचिते त्रिरेखकम्बुकण्ठगे,
त्रिसुत्रमंगलीगुण त्रिरत्नदीप्तिदीधिअति।
सलोलनीलकुन्तले प्रसूनगुच्छगुम्फिते,
कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (८)

भावार्थ : आप स्वर्ण की मालाओं से विभूषित है, आप तीन रेखाओं युक्त शंख के समान सुन्दर कण्ठ वाली हैं, आपने अपने कण्ठ में प्रकृति के तीनों गुणों का मंगलसूत्र धारण किया हुआ है, इन तीनों रत्नों से युक्त मंगलसूत्र समस्त संसार को प्रकाशमान कर रहा है। आपके काले घुंघराले केश दिव्य पुष्पों के गुच्छों से अलंकृत हैं, हे कीरतिनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (८)

(श्लोक – ९)

नितम्बबिम्बलम्बमान पुष्पमेखलागुण,
प्रशस्तरत्नकिंकणी कलापमध्यमंजुले।
करीन्द्रशुण्डदण्डिका वरोहसोभगोरुके,
कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (९)

भावार्थ : आपका उर भाग में फूलों की मालाओं से शोभायमान हैं, आपका मध्य भाग रत्नों से जड़ित स्वर्ण आभूषणों से सुशोभित है। आपकी जंघायें हाथी की सूंड़ के समान अत्यन्त सुन्दर हैं, हे ब्रजनन्दनी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (९)

(श्लोक – १०)

अनेकमन्त्रनादमंजु नूपुरारवस्खलत्,
समाजराजहंसवंश निक्वणातिग।
विलोलहेमवल्लरी विडमि्बचारूचं कमे,
कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (१०)

भावार्थ : आपके चरणों में स्वर्ण मण्डित नूपुर की सुमधुर ध्वनि अनेकों वेद मंत्रो के समान गुंजायमान करने वाले हैं, जैसे मनोहर राजहसों की ध्वनि गूँजायमान हो रही है। आपके अंगों की छवि चलते हुए ऐसी प्रतीत हो रही है जैसे स्वर्णलता लहरा रही है, हे जगदीश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (१०)

(श्लोक – ११)

अनन्तकोटिविष्णुलोक नमपदमजाचिते,
हिमादिजा पुलोमजा-विरंचिजावरप्रदे।
अपारसिदिवृदिदिग्ध -सत्पदांगुलीनखे,
कदा करिष्यसीह मां कृपा -कटाक्ष भाजनम्॥ (११)

भावार्थ : अनंत कोटि बैकुंठो की स्वामिनी श्रीलक्ष्मी जी आपकी पूजा करती हैं, श्रीपार्वती जी, इन्द्राणी जी और सरस्वती जी ने भी आपकी चरण वन्दना कर वरदान पाया है। आपके चरण-कमलों की एक उंगली के नख का ध्यान करने मात्र से अपार सिद्धि की प्राप्ति होती है, हे करूणामयी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (११)

(श्लोक – १२)

मखेश्वरी क्रियेश्वरी स्वधेश्वरी सुरेश्वरी,
त्रिवेदभारतीयश्वरी प्रमाणशासनेश्वरी।
रमेश्वरी क्षमेश्वरी प्रमोदकाननेश्वरी,
ब्रजेश्वरी ब्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते॥ (१२)

भावार्थ : आप सभी प्रकार के यज्ञों की स्वामिनी हैं, आप संपूर्ण क्रियाओं की स्वामिनी हैं, आप स्वधा देवी की स्वामिनी हैं, आप सब देवताओं की स्वामिनी हैं, आप तीनों वेदों की स्वामिनी है, आप संपूर्ण जगत पर शासन करने वाली हैं। आप रमा देवी की स्वामिनी हैं, आप क्षमा देवी की स्वामिनी हैं, आप आमोद-प्रमोद की स्वामिनी हैं, हे ब्रजेश्वरी! हे ब्रज की अधीष्ठात्री देवी श्रीराधिके! आपको मेरा बारंबार नमन है। (१२)

(श्लोक – १३)

इतीदमतभुतस्तवं निशम्य भानुननि्दनी,
करोतु संततं जनं कृपाकटाक्ष भाजनम्।
भवेत्तादैव संचित-त्रिरूपकमनाशनं,
लभेत्तादब्रजेन्द्रसूनु मण्डलप्रवेशनम्॥ (१३)

भावार्थ : हे वृषभानु नंदिनी! मेरी इस निर्मल स्तुति को सुनकर सदैव के लिए मुझ दास को अपनी दया दृष्टि से कृतार्थ करने की कृपा करो। केवल आपकी दया से ही मेरे प्रारब्ध कर्मों, संचित कर्मों और क्रियामाण कर्मों का नाश हो सकेगा, आपकी कृपा से ही भगवान श्रीकृष्ण के नित्य दिव्यधाम की लीलाओं में सदा के लिए प्रवेश हो जाएगा। (१३)

॥ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र ॥

बुधवार, 2 सितंबर 2026

कुछ न कुछ तो जरूर होना है.../ शायरा : वाजिदा तबस्सुम / गायन : निताशा शर्मा

https://youtu.be/0PULSsRE17M  


कुछ न कुछ तो ज़रूर होना है,
सामना आज उनसे होना है


तोड़ो, फेंकों, रखो, करो कुछ भी,
दिल हमारा है, क्या खिलौना है


ज़िंदगी और मौत का मतलब,
तुमको पाना है, तुमको खोना है


इतना डरना भी क्या है दुनिया से,
जो भी होना है सो तो होना है


उठ के महफ़िल से मत चले जाना,
तुमसे रोशन ये कोना-कोना है

रविवार, 30 अगस्त 2026

पद्मनाभा नारायणा.../ अभंग : सन्त तुकाराम / गायन : आर्या अम्बेकर

https://youtu.be/oBokNBRiWrQ 



श्रीअनंता मधुसूदना । 
पद्मनाभा नारायणा ॥१॥ 

सकळदेवा आदिदेवा । 
कृपाळुवा जी केशवा । 
महानंदा महानुभावा । 
सदाशिवा सहजरूपा ॥२॥ 

अगा ये सगुणा निर्गुणा । 
जगज्जनित्या जगज्जीवना । 
वसुदेवदेवकीनंदना । 
बाळरांगणा बाळकृष्णा ॥३॥ 

तुका आला लोटांगणी । 
मज ठाव द्यावा जी चरणीं । 
हे चि करीतसें विनवणी । 
भवबंधनीं सोडवावें ॥४॥

सोमवार, 24 अगस्त 2026

ब्रज नव तरुणि-कदम्ब मुकुटमणि.../ श्री हित चौरासी – पद संख्या 29

https://youtu.be/U_vGie0HaRk  


ब्रज नव तरुणि-कदम्ब मुकुटमणि,
श्यामा आजु बनी।
नख-सिख लौं अँग-अंग माधुरी,
मोहे श्याम धनी॥

यौं राजत कवरी गूँथित कच,
कनक-कंज-वदनी।
चिकुर चंद्रिकन बीच अर्ध बिधु,
मानौँ ग्रसित फनी॥

सौभग रस सिर स्रवत पनारी,
पिय सीमन्त ठनी।
भृकुटि काम-कोदंड नैंन-सर,
कज्जल रेख अनी॥

तरल तिलक, ताटंक गंड पर,
नासा जलज मनी।
दसन कुन्द, सरसाधर पल्लव,
प्रीतम मन समनी॥

चिबुक मध्य अति चारु सहज सखि,
साँवल बिंदुकनी।
प्रीतम प्राण रतन संपुट कुच,
कंचुकि कसिब तनी॥

भुज-मृनाल बल हरत बलय जुत,
परस सरस स्रवनी।
श्याम सीस तरु मनौ मिडवारी,
रची रुचिर रवनी॥

नाभि गंभीर मीन मोहन मन,
खेलन कौँ हृदनी।
कृस कटि, पृथु नितम्ब किंकिनि व्रत,
कदलि-खंभ जघनी॥

पद अम्बुज जावक जुत भूषण,
प्रीतम उर अवनी।
नव-नव भाय विलोभि भाम इभ,
बिहरत वर करिनी॥

(जै श्री) हित हरिवंश प्रशंसित श्यामा,
कीरति विशद घनी।
गावत स्रवनन सुनत सुखाकर,
विश्व दुरित दवनी॥

रविवार, 23 अगस्त 2026

ये बातें झूटी बातें हैं.../ शायर : इब्न-ए-इंशा / गायन : ग़ुलाम अली

https://youtu.be/2OOcNnWwYPs  


ये बातें झूटी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं

हैं लाखों रोग ज़माने में क्यूँ इश्क़ है रुस्वा बे-चारा
हैं और भी वजहें वहशत की इंसान को रखतीं दुखियारा
हाँ बे-कल बे-कल रहता है हो पीत में जिस ने जी हारा
पर शाम से ले कर सुब्ह तलक यूँ कौन फिरेगा आवारा

ये बातें झूटी बातें ये लोगों ने फैलाईं हैं
तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं

ये बात अजीब सुनाते हो वो दुनिया से बे-आस हुए
इक नाम सुना और ग़श खाया इक ज़िक्र पे आप उदास हुए
वो इल्म में अफ़लातून सुने वो शेर में तुलसीदास हुए
वो तीस बरस के होते हैं वो बी-ए एम-ए पास हुए

ये बातें झूटी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं

गर इश्क़ किया है तब क्या है क्यूँ शाद नहीं आबाद नहीं
जो जान लिए बिन टल न सके ये ऐसी भी उफ़्ताद नहीं
ये बात तो तुम भी मानोगे वो 'क़ैस' नहीं फ़रहाद नहीं
क्या हिज्र का दारू मुश्किल है क्या वस्ल के नुस्ख़े याद नहीं

ये बातें झूटी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं

वो लड़की अच्छी लड़की है तुम नाम न लो हम जान गए
वो जिस के लम्बे गेसू हैं पहचान गए पहचान गए
हाँ साथ हमारे 'इंशा' भी इस घर में थे मेहमान गए
पर उस से तो कुछ बात न की अंजान रहे अंजान गए

ये बातें झूटी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं

जो हम से कहो हम करते हैं क्या 'इंशा' को समझाना है
उस लड़की से भी कह लेंगे गो अब कुछ और ज़माना है
या छोड़ें या तकमील करें ये इश्क़ है या अफ़साना है
ये कैसा गोरख-धंदा है ये कैसा ताना-बाना है

ये बातें कैसी बातें हैं जो लोगों ने फैलाई हैं
तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं

शनिवार, 22 अगस्त 2026

तेरी काया नगर का कुण धणी.../ रचना : सन्त कबीर / गायन : शबनम वीरमानी

https://youtu.be/Z3H7NmiNtnc  


तेरी काया नगर का कुण धणी, मारग में लूटे पांच जणी
पांच जनी, पच्चीस जनी, मारग में लूटे पांच जणी

आशा तृष्णा नदियां भारी, बह गये संत बड़ा ब्रह्मचारी, हरे हरे
जो उबरया जो शरण तुम्हारी, चमक रही है सेलाणी

बन में लुट गये मुनीजन नंगा, डस गयी ममता उल्टा टांगा, 
हरे-हरे

जाके कान गुरु नहीं लागे, सृंगी ऋषी पर आन पड़ी
साधू संत मिल रोके घांटा, साधु चढ़ ग्या उल्टी बाटा, 
हरे-हरे

घेर लिया सब औघट घाटा, पार उतारो आप धणी
ईन्द्र बिगाड़ी गौतम नारी, कुबजा भई गया कृष्ण मुरारी, 
हरे-हरे

राधा रुखमा बिलकति हारी, राम चन्द्र पर आन बणी
शंकर लुट गये नेजाधारी, रईयत उनकी कौन बिचारी, 
हरे-हरे

भूल रही कर मन की मारी, तीन युग झुक रही तीन जणी
साहेब कबीर गुरु दीन्हा हेला, धर्मदास सुनो निज चेला, 
हरे-हरे

लंबा मारग पंथ दुहेला, सिमरो सिरजन हार धनी

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

मेरा तो क्या ख़ुशी में रहूँ या मलाल में.../ शायर : नज़ीर मोहम्मद आरज़ू जयपुरी / गायन : हीरा देवी मिश्रा

https://youtu.be/toxvr57T1U0. 

मेरा तो क्या ख़ुशी में रहूँ या मलाल में
तुम ख़ुश रहो जहाँ भी रहो जिस ख़याल में


हूँ महव मैं तो ऐसा किसी के ख़याल में
कुछ इम्तियाज़ ही नहीं हिज्र-ओ-विसाल में


तेरे ख़याल ही की बदौलत है ज़िंदगी
तू है तो इक जहान है मेरे ख़याल में


हाइल अगर हज़ार हों पर्दे तो कुछ नहीं
तुम हो मिरी निगाह में दिल में ख़याल में


होता रहे करम जो यूँही ऐ ख़याल-ए-यार
लग़्ज़िश न हो कभी मिरे पाए-ए-ख़्याल में


है तू तो हर घड़ी मिरी आँखों के सामने
आता हूँ मैं भी क्या कभी तेरे ख़याल में


शेर-ओ-सुख़न की 'आरज़ू' अब दाद क्या मिले
ज़ौक़-ए-सुख़न ही जब नहीं अहल-ए-कमाल में

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे.../ शायर : बहज़ाद लखनवी / गायन : निर्मला देवी

https://youtu.be/0LPDgc9Q8yI 


दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
वर्ना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे

ऐ देखने वालो मुझे हँस हँस के न देखो
तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे

मैं ढूँढ रहा हूँ मिरी वो शम्अ कहाँ है
जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे

आख़िर कोई सूरत भी तो हो ख़ाना-ए-दिल की
काबा नहीं बनता है तो बुत-ख़ाना बना दे

'बहज़ाद' हर इक गाम पे इक सज्दा-ए-मस्ती
हर ज़र्रे को संग-ए-दर-ए-जानाना बना दे