सोमवार, 24 अप्रैल 2023

पिया बिन तरसत रहूँ दिन रैना.../ सजण दारी उभा.../ गायन : आर्या अम्बेकर

 https://youtu.be/g9T--w37aGE  

'पिया बिन तरसत रहूँ दिन रैना'
इस बंदिश की गीत एवं संगीत रचना आर्या अम्बेकर
की माता जी श्रीमती श्रुति अम्बेकर ने की है।
'सजण दारी उभा' (भाव गीत)
गीत के बोल प्रख्यात श्री सुरेश भट जी के हैं और संगीत
डॉ.सलिल कुलकर्णी का है।

'पिया बिन तरसत रहूँ दिन रैना'
पिया बिन तरसत रहूँ दिन रैना पिया बिन तरसत रहूँ दिन रैना पिया बिन तरसत रहूँ दिन रैना पिया बिन तरसत रहूँ दिन रैना, दिन रैना सजन बिन जिया बैचेन, बरसत मोरे नैन
पिया बिन तरसत रहूँ दिन रैना
'सजण दारी उभा' (भाव गीत /मराठी) सजण दारी उभा, काय आता करू? सजण दारी उभा, काय आता करू? घर कधी आवरू? मज कधी सावरू? सजण दारी उभा
मी न केली सखे, अजुन वेणीफणी मी न केली सखे, अजुन वेणीफणी मी न पुरते मला निरखिले दर्पणी अन् सडाही न मी टाकिला अंगणी राहिले नाहणे, राहिले नाहणे, कुठुन काजळ भरू? घर कधी आवरू? मज कधी सावरू? सजण दारी उभा मी न दुबळी कुडी अजुन शृंगारली मी न सगळीच ही आसवे माळिली मी न दुबळी कुडी अजुन शृंगारली मी न सगळीच ही आसवे माळिली प्राणपूजा न मी अजुनही बांधिली काय दारातुनी, काय दारातुनी परत मागे फिरू? घर कधी आवरू? मज कधी सावरू? सजण दारी उभा बघ पुन्हा वाजली थाप दारावरी बघ पुन्हा वाजली थाप दारावरी हीच मी ऐकिली जन्मजन्मांतरी तीच मी राधिका, तोच हा श्रीहरी हृदय माझे कसे, हृदय माझे कसे मीच हृदयी धरू? पर पर घर कधी आवरू? मज कधी सावरू? सजण दारी उभा

(सजण दारी उभा - सजन द्वार पर खड़ा है)

रविवार, 23 अप्रैल 2023

जय जय जगजननि देवि.../ विनय पत्रिका / गोस्वामी तुलसी दास / गायन : कौशिकी चक्रवर्ती

 https://youtu.be/9HTWoFg6Vcc 

जय जय जगजननि देवि सुर-नर-मुनि-असुर-सेवि,
भुक्ति-मुक्ति-दायनी, भय-हरणि कालिका ।
मंगल-मुद-सिद्धि-सदनि, पर्व शर्वरीश-वदनि,
ताप-तिमिर-तरुण-तरणि-किरणमालिका ॥१॥

वर्म, वर्मचर्म कर कृपाण, शूल-शेल-धनुषबाण,
धरणि, दलनि दानव-दल, रण-करालिका ।
पूतना-पिशाच-प्रेत-डाकिनि-शाकिनि-समेत,
भूत-ग्रह-बेताल-खग-मृगालि-जालिका ॥२॥

जय महेश-भामिनी, अनेक-रूप-नामिनी,
समस्त-लोक-स्वामिनी, हिमशैल-बालिका ।
रघुपति-पद परम प्रेम, तुलसी यह अचल नेम,
देहु ह्वै प्रसन्न पाहि प्रणत-पालिका ॥३॥

शनिवार, 22 अप्रैल 2023

पिया की नजरिया जादू भरी.../ पारम्परिक बन्दिश / गायन : पूर्वी गरुड़

 https://youtu.be/EdLDvNEla6o -  


पिया की नजरिया जादू भरी 
मोह लियो मन प्रेम भरी। 

कवन जतन अब करिये आली
नाही परत मोहे चैन इक घड़ी।।



गुरुवार, 20 अप्रैल 2023

शिव संकल्प मन्त्रों का पद्यानुवाद / रचयिता : पं. सत्यपाल पथिक / स्वर : डॉ. सुशील आर्य

 https://youtu.be/UO03QZD6eds 

शिव संकल्प सूक्त यजुर्वेद का ३४ वां अध्याय और
अष्टाध्यायी रुद्री का प्रथम अध्याय है ।
"शिव संकल्प" अर्थात कल्याणकारी विचार।
इस गीत में शिव संकल्प सूक्त के मन्त्रों का सुन्दर
पद्यात्मक अनुवाद, प्रसिद्ध भजनोपदेशक आशु
कवि पं. सत्यपाल पथिक जी द्वारा किया गया है।

हे परमेश्वर ! ये मेरा मन, शिव संकल्पों वाला हो।
कभी अँधेरा पास न आये चारों ओर उजाला हो

जो मन जाग्रत कार्यकाल में, दूर-दूर तक जाता है,
सो जाने पर भी वैसे ही, इधर-उधर लहराता है।
दिव्य ज्योतियों की ज्योति बन, राह दिखने वाला हो।
हे परमेश्वर ! ये मेरा मन, शिव संकल्पों वाला हो।
हे परमेश्वर ! ये मेरा मन, शिव संकल्पों वाला हो
सदा मनीषी कर्मशील ज्ञानी कर्मों को करते हुए,
यज्ञों और संग्रामों में भी अद्भुत सहस भरते हुए।
मेरा मन पूजित जन-जन में, सबका देखा-भाला हो।
हे परमेश्वर ! ये मेरा मन, शिव संकल्पों वाला हो।
हे परमेश्वर ! ये मेरा मन, शिव संकल्पों वाला हो

भूत, भविष्यत्, वर्तमान को किया हुआ जिसने धारण।
तीनों लोकों का परिचय मिलता है, जिसके ही कारण।
याजक जिससे यज्ञ करें, उस मन का तेज निराला हो।
हे परमेश्वर ! ये मेरा मन, शिव संकल्पों वाला हो।
हे परमेश्वर ! ये मेरा मन, शिव संकल्पों वाला हो

ऋग, यजु, साम, अथर्व वेद जिसमें इस तौर धरे होते हैं।
जैसे रथ के पहिये की नाभि से युक्त अरे होते हैं।
ज्ञान हो जिसमें ओत-प्रोत, मन सुमन सुगन्धित माला हो।
हे परमेश्वर ! ये मेरा मन, शिव संकल्पों वाला हो।
हे परमेश्वर ! ये मेरा मन, शिव संकल्पों वाला हो

जैसे कोई कुशल सरथि ,घोड़ों को दौड़ाता है।
वैसे ही मन भी, जन-जन को मंज़िल तक पहुंचाता है।
पथिक वही मन ह्रदय-निवासी, अजर-अमर गति वाला हो।
हे परमेश्वर ! ये मेरा मन, शिव संकल्पों वाला हो।
हे परमेश्वर ! ये मेरा मन, शिव संकल्पों वाला हो

सोमवार, 17 अप्रैल 2023

बहे निरन्तर अनन्त आनन्दधारा../ रचना : रविंद्र नाथ टैगोर / गायन : प्रमिता मल्लिक

https://youtu.be/fKel9b4S2C8

BANGLA LYRICS
বহে নিরন্তর অনন্ত আনন্দধারা ॥
বাজে অসীম নভোমাঝে অনাদি রব,
জাগে অগণ্য রবিচন্দ্রতারা ॥
একক অখণ্ড ব্রহ্মাণ্ডরাজ্যে
পরম-এক সেই রাজরাজেন্দ্র রাজে।
বিস্মিত নিমেষহত   বিশ্ব চরণে বিনত,
লক্ষশত ভক্তচিত বাক্যহারা ॥
HINDI TRANSLITERATION

बहे निरन्तर अनन्त आनन्दधारा॥
बाजे असीम नभो माझे अनादि रब,
जागे अगण्य रबिचन्द्रतारा ॥
एकक अखण्ड ब्रह्माण्डराज्ये
परम-एक सेइ राजराजेन्द्र राजे।
बिस्मित निमेषहत   बिश्ब चरणे बिनत,
लक्षशत भक्तचित बाक्यहारा। 

ENGLISH TRANSLATION
By Ratna De
Eternally flows the never-ending stream of happiness
Resonates in the infinite space the primal sound
Awakens the innumerable suns, moons and stars,
In the unified unbroken universe
Reigns supreme the one King of Kings
In amazement the world bows in humility
And millions of devotees in speechless wonderment.

रविवार, 16 अप्रैल 2023

सेजिया से सैयां रूठ गइलें हो रामा, कोयल तोरी बोलिया.../ चैती / गायन : श्रुति प्रभला

 https://youtu.be/7U2j0HOR5Wk  

सेजिया से सैयां रूठ गइलें हो रामा, कोयल तोरी बोलिया...
चैती 
राग : मिश्र पहाड़ी 

सेजिया से सैयां रूठि गइलें हो रामा, 
कोयल तोरी बोलिया... 

रोज तू बोलेली सांझ-सबेरवा, 
आज काहे बोले आधी रतिया हो रामा, 
कोयल तोरी बोलिया... 

होत भोर तोरा खोतवा उजरिबों 
और कटइहों बन-बगिया हो रामा,
कोयल तोरी बोलिया... 

सेजिया से सैयां रूठि गइलें हो रामा, 
कोयल तोरी बोलिया...  

शनिवार, 15 अप्रैल 2023

तन्मे मन: शिव संकल्पमस्तु.../ शिव संकल्प सूक्त / शुक्ल यजुर्वेद / स्वर : कर्दमशर्मा जोशी एवं तृप्ति दवे

 https://youtu.be/MP-ujifat6M 

शिव संकल्प सूक्त यजुर्वेद का ३४ वां अध्याय और
अष्टाध्यायी रुद्री का प्रथम अध्याय है ।
छः अति सुंदर एवं ज्ञान प्रभा से आच्छादित सूक्तों 
को पिरोकर शिव संकल्प सूक्त की रचना हुई है,
जिसका वर्णन शुक्ल यजुर्वेद में आता है। हर सूक्त 
का अंत इस वाक्यांश के साथ होता है – 
“तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु” अर्थात – “उस ईश्वरीय 
शुभ संकल्प में मेरा मन रमण करे।” यह सूक्त एक 
अद्भुत एवं गहन प्रार्थना है जिसके द्वारा मन अत्यंत 
शांत हो जाता है एवं साधक को अपने आत्म स्वरुप 
को पहचानने की क्षमता प्राप्त होती है। 

संकल्प
             (यजुर्वेद अध्याय ३४, मंत्र १-६) 

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु 
॥१॥

येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः
सदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु  
॥२॥

यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु
यस्मान्न ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु 
॥३॥

येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु 
॥४॥

यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः
यस्मिश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु 
॥५॥

सुसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु 
॥६॥

अर्थ 
वह दिव्य ज्योतिमय शक्ति (मन) जो हमारे जागने की अवस्था में 
बहुत दूर तक चला जाता हैऔर हमारी निद्रावस्था में हमारे पास 
आकर आत्मा में विलीन हो जाता है,वह प्रकाशमान श्रोत जो हमारी 
इंद्रियों को प्रकाशित करता है, मेरा वह मन शुभसंकल्प युक्त हो ॥१॥

जिस मन की सहायता से ज्ञानीजन (ऋषिमुनि इत्यादि) कर्मयोग 
की साधना में लीन यज्ञ,जप,तप करते हैं, वह (मन) जो सभीजनों 
के शरीर में विलक्षण रुप से स्थित है, मेरा वह मन शुभसंकल्प 
युक्त हो ॥२॥

जो मन ज्ञान, चित्त , व धैर्य स्वरूप , अविनाशी आत्मा से युक्त 
इन समस्त प्राणियों के भीतर ज्योति सवरुप विद्यमान है, वह 
मेरा मन शुभसंकल्प युक्त हो ॥३॥

जिस शाश्वत मन द्वारा भूत,भविष्य व वर्तमान काल की सारी 
वस्तुयें सब ओर से ज्ञात होती हैं,और जिस मन के द्वारा 
सप्तहोत्रिय यज्ञ (सात ब्राह्मणों द्वारा किया जाने वाला यज्ञ) 
किया जाता है, मेरा वह मन शुभसंकल्प युक्त हो ॥४॥

जिस मन में ऋग्वेद की ऋचाये व सामवेद व यजुर्वेद के मंत्र उसी 
प्रकार स्थापित हैं, जैसे रथ के पहिये की धुरी से तीलियाँ जुड़ी होती 
हैं, जिसमें सभी प्राणियों का ज्ञान कपड़े के तंतुओं की तरह बुना 
होता है, मेरा वह मन शुभसंकल्प युक्त हो ॥५॥

जो मन हर मनुष्य को इंद्रियों का लगाम द्वारा उसी प्रकार घुमाता 
है, तिस प्रकार एक कुशल सारथी लगाम द्वारा रथ के वेगवान 
अश्वों को नियंत्रितकरता व उन्हें दौड़ाता है, आयुरहित (अजर) तथा 
अति वेगवान व प्रणियों के हृदय में स्थित  मेरा वह मन शुभसंकल्प 
युक्त हो ॥६॥