https://youtu.be/h-_GZHwK108
गोपी गोपाल लाल
रासमंडल माहीं ।
तात्ताथेई ता सुधंग
निरत गहि बाहीं ।।
रासमंडल माहीं ।
तात्ताथेई ता सुधंग
निरत गहि बाहीं ।।
द्रुम द्रुम द्रुम द्रुम मृदंग
छन नन नन रूप रंग
दृगतादृग तालतंग
उघटत रसनाई ।।
बीच लाल बीच बाल
प्रति प्रति अति द्युति रसाल
अविगत गति अति उदार
निरखि दृग सराहीं ।।
श्रीराधामुख शरत चंद
पोंछत जल श्रम अनंद
श्रीव्रजचंद लटक लटकत
करत मुकुट छाहीं ।।
चकित थकित यमुना नीर
खग मृग जग मग शरीर
धन नंदके कुमार बलि-बलि जाय
सूरदास रास सुख तिहारहीं ।।
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