रविवार, 20 मई 2012

बेटी को बचाइये : सन्दर्भ मदर्स डे

बेटी को बचाइये : सन्दर्भ मदर्स डे
-अरुण मिश्र.

आज   है  मदर्स  डे !  आज   है  मदर्स  डे ! 
                             मातृ-दिवस का न सिर्फ शोर यूँ मचाइये| 
माँ तो है, नित्य-प्रति पूज्यनीय, वन्दनीय; 
                             एक दिन का  ये  छद्म  स्वाँग  न रचाइये| 
नारी के विरुद्ध  जो समाज में भरा है विष;  
                             नीलकंठ  बनिए,  इस विष को  पचाइये| 
माता का सचमुच सम्मान है अभीष्ट यदि, 
                               माँ के निमित्त  पहले बेटी को  बचाइये||
                                                  *   

रविवार, 13 मई 2012

मेरे मन का हिरन कैसे औ' बच के किधर जाता........


ग़ज़ल 

मेरे मन का हिरन कैसे औ' बच के किधर जाता........ 

-अरुण मिश्र. 

ये कमी अगर न होती, तो क्या बात पे  मर जाता।
तुझ   सा  दिलेर  होता,  तो  कह के  मुक़र  जाता॥

कभी  लू   के  थपेड़ों  सा,  कभी  सर्द  हवाओं  सा।
बेदर्द   खिज़ाओं  सा,  मैं  चमन  से  गुज़र  जाता॥

हर पत्ते  में, कोंपल  में,  हर गुन्चे  में,  हर ग़ुल में।
मुझे  हर  बहार में  है,  कोई  अपना  नज़र  आता॥

जब   फूलते   शज़र   हैं,   औ'   झूमती   है  शाख़ें।
तो फ़िज़ा में खुशनुमा सा, तेरा अक्स उभर आता॥

हम  अपनी  गिरानी  को,  तक़दीर  ग़र  न  कहते।
इल्ज़ाम   गिराने   का,   तो   तेरे   ही   सर  जाता॥

कुछ  जाल थे  ज़ुल्फ़ों  के,  कुछ  बाड़ निगाहों की।
मेरे मन का हिरन कैसे,  औ' बच के किधर जाता॥

ऐ काश! 'अरुन'  तुम  भी, कुछ  दुनियादार  होते।
तो  टूटती  न  लाठी,  औ'   सॉप  भी    मर  जाता॥
                                       *

मंगलवार, 8 मई 2012

देखता हूँ मैं अक्सर गौर से जमाने को..........

ग़ज़ल

देखता हूँ मैं अक्सर गौर से जमाने को......... 

-अरुण मिश्र   


देखता   हूँ   मैं   अक्सर,  गौर  से   जमाने  को।
हँस  के  दिल लगाने को, फिर  फ़रेब  खाने को॥


दिल पे चोट लगती है,फिर भी दिल मचलता है। 
मीठे-मीठे  वादे  को ,   दिलशिकन   बहाने  को॥


इन  नज़र  के तीरों की , माना है  बहुत शोहरत।
मैं ही क्या  मिला  तुझको , तीर  आज़माने को??


देख इन शरीफों  को,  किसका मन नहीं मचले?
कीच   में   लिपटने   को,  इत्र   में   नहाने  को॥ 

इन्तजामे - कुदरत    है,  दाँत  दो  तरह  के  हैं।
ढेर   सारे   खाने   को ,  एक - दो   दिखाने  को॥


पाप   की    बहे   गंगा ,   आदमी    खड़ा    नंगा।
हैं   यहाँ   सभी  आतुर ,   डुबकियाँ   लगाने को॥


आप'अरुन' दुनिया में,किसको समझिये अपना। 
शुक्रिया   मगर  कहिये,  इस   यतीमखाने   को॥
                                     *


   

रविवार, 29 अप्रैल 2012

एहसासे-बुलंदी से तो नाहक़ घिरे हैं लोग........

ग़ज़ल

-अरुण मिश्र.

एहसासे-बुलंदी  से  तो  नाहक़  घिरे हैं  लोग। 
इन्सानियत की हद से भी नीचे गिरे हैं लोग॥


लड़ते   जो   अक़ीदों  पे,  कोई  और  बात थी। 
लड़ते हैं ज़ुबानों  पे, अज़ब  सिरफिरे  हैं लोग॥
  
उलझे हों कि सुलझे हों, पै उम्मीद  इन्हीं  से। 
अल्लाह की पहेली के , खुलते सिरे   हैं  लोग॥
  
दैरो - हरम   में   ढूढ़ते,  शम्में   जला - जला। 
वो  नूर , बख़ुद  जिसमें  सरो-पा घिरे हैं लोग॥
  
सब  वक़्त की  है बात, ये शाहो-गदा के  खेल। 
जो आज तेरे साथ  'अरुन'  सब  मिरे हैं लोग॥
                                  *

रविवार, 22 अप्रैल 2012

यारब! ज़रूर कीजियो वाइज़ का बेड़ा ग़र्क.........

ग़ज़ल 

-अरुण मिश्र. 


ऐशे-बहिश्त   के   लिये , लुत्फ़े- ज़माना   तर्क। 
या रब!  ज़रूर कीजियो , वाइज़  का  बेड़ा  ग़र्क॥ 


उनकी  तो  उम्र ढल गई,  अब  रब से  लौ लगी। 
हम तो  अभी जवान हैं , हमको   पड़े  है   फ़र्क॥ 


रस  हो,  न रंग हो,  न  राग,  मौज ,  न  मस्ती। 
हंगामा हुस्नो-इश्क़  का, न  हो  तो  ज़मीं  नर्क॥ 


ऋषियों की  हैं  सन्तान , न  साक़ी  निगाह फेर। 
जीते थे  सौ बरस कि ,  जो  पीते थे  सोम-अर्क़॥ 


पर्दा  बहुत  'अरुन'  था, पै' जो  अपनी  पे  आये। 
आख़िर   को  कोहे-तूर पे,चमकी ही आ के बर्क॥
                                  *

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

फ़ित्नासामां हैं साँवली आँखें............












फ़ित्नासामां हैं 
साँवली आँखें............



ग़ज़ल  


-अरुण मिश्र.

देखिये    तो    लगें    भली   आँखें। 
फ़ित्नासामां    हैं    साँवली    आँखें॥

देखती  भी   हैं,   देखती  भी   नहीं। 
बावला   कर   दें,   बावली   आँखें॥

क्यूँ  मचायें न दिल में वो हलचल। 
कितनी  चंचल हैं,  मनचली आँखें॥

वो जगा तो 'अरुन'  की  नींद  उड़ी। 
ली  जो  अँगड़ाई,   हैं  मली  आँखें॥
                       *

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

राम के चरणों में फरियाद किया..............



&अरुण  मिश्र

राम के  चरणों में  फरियाद किया।
तुलसी बाबा को  सदा  याद किया।।

गर  ग़मे & ज़िन्दगी   से  घबराये।
दिल को शेरो&सुखन से शाद किया।।

मेरी    बरबादियों  पे  मत  जाओ।   
मैंने  मन का  नगर आबाद किया।।

शायरी]  ज़िन्दगी लगे है   ^अरुन*।
हज़रते& मीर  को   उस्ताद  किया।।