शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

महालक्ष्मी अष्टकम् ( क्रमशः २)

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महालक्ष्मी अष्टकम्
का काव्य-भावानुवाद ( क्रमशः २ )

-अरुण मिश्र.

नमन तुम्हें  हे गरुड़ारूढ़ा !  कोलासुर के हेतु   भयङ्करि !
देवि !  समस्त पाप  हरती हो;  महालक्ष्मी तुम्हें नमन है।।२।।


                                      *

मूल संस्कृत  :

                        इन्द्र उवाच

नमस्ते  गरुडारूढे  कोलासुरभयङ्करि।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥२।।


                                   *
 

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

महालक्ष्मी अष्टकम्



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महालक्ष्मी अष्टकम्

"हंस मर रहे भूखे , उल्लुओं की  पौ बारह,
 लक्ष्मी मैया की भी सुरसती से क्या ठनी ॥"

                                         

                                           -अरुण मिश्र

शरद् पूर्णिमा बीत गयी है।
दीपावली का पक्ष प्रारम्भ हो गया है।
इस दीपावली में सरस्वती मइया की कृपा से,
इन्द्रकृत लक्ष्मी अष्टकम् (जो संभवतः पद्मपुराण में है)
का भावानुवाद करने को ठाना है।
लक्ष्मी मैया और सरस्वती मैया का बैर जग जाहिर है।
अब भगवान ही बेड़ा पार करें। (और ये दोनोँ देवियाँ भी
क्षमाशील एवं कृपालु होवें।)

काव्य-भावानुवाद (क्रमशः) :

तुम्हें प्रणाम  महामाया हे ! श्रीपीठ-स्थित, सुरगण-पूजित।
शंख, चक्र औ’ गदा लिये कर,   महालक्ष्मी   तुम्हें  नमन है।।१॥


मूल संस्कृत  :

                        इन्द्र उवाच

नमस्तेस्तु  महामाये   श्रीपीठे   सुरपूजिते।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोस्तु ते॥१॥


   

बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

आज शरद पूर्णिमा......

Shubh Sharad Purnima

आज शरद पूर्णिमा......

-अरुण मिश्र.

आज शरद पूर्णिमा
शरद का चाँद
आज अमृत बरसेगा ॥ 


प्रासादों  के  दीर्घ  अजिर में
महलों के विस्तीर्ण छतों पर ।
भर-भर  खीर   रखे  जायेंगे
रजत  कटोरे  रात-रात  भर ॥

 
जिन में चाँद
अमृत घोलेगा
राज कुँवर फिर उसे छकेगा ॥ 


पर उनका क्या होगा, जिनके
थाली   में     रोटी   के   लाले । 
खीर    कहाँ   से   वो   लाएंगे
जिन को मिलते नहीं निवाले ॥ 


पूर्ण चन्द्र फिर पीड़ा देगा
फिर उन का
ललुआ तरसेगा ॥ 


चन्दा तो सब का है,  सब पर 
शीतलता,   चाँदनी    लुटाता ।
काश कि, चन्दा सीधे सब की 
जिह्वा  पर  अमृत  टपकाता ॥

ऐसा हो तो शरद पूर्णिमा 
सार्थक;  सब का
मन हरषेगा ॥ 

          * 
        

Picture: Shubh Sharad Purnima




शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

फिर क्यूँ सन्नाटा.......

पिछली एक पोस्ट में तीन पदों की कुछ छोटी-छोटी
तुकांत रचनाएँ, पदवार क्रमशः ३, ५, ३ के शब्द-विधान
में प्रस्तुत की थीं। उसी क्रम में कुछ और त्रिपदियाँ प्रस्तुत हैं ।        


फिर क्यूँ सन्नाटा.......

- अरुण मिश्र

कैसी अनहोनी हुई।
मौत के थे हाथ लम्बे;
जि़न्दगी बौनी हुई।।


फिर क्यूँ सन्नाटा ?
सन्नाटे का विषम जाल तो,
ध्वनियों ने काटा।।


निर्मित जिनसे चीर।
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर;
करते हमें अधीर।।


चुप धरती, आकाश।
प्रकृति चीन्हती मन का त्रास,
होती साथ उदास।।


तेरा मन है।
रूप, रंग, रस, गन्ध लुटाता,
खिला सुमन है।।

               *


 

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचित श्री यमुनाष्टकम् का भावानुवाद

जगद्गुरु शङ्कराचार्य  की रचनाएँ न केवल भक्ति के
पावन गङ्गा में डुबकी लगवाती हैं अपितु , काव्य के
निर्मल निर्झरणी में काव्य-रसिकों को आनंदमय -स्नान
के लाभ का अवसर भी प्रदान करती हैं ।

मई, २००२ में श्रीमत् शङ्कराचार्य विरचित इस  
यमुनाष्टक का मेरे द्वारा किया गया भावानुवाद
कागजों में कहीं खो गया था जो अचानक कल मिल गया । 
इसे सभी काव्य-रसिकों एवं  'शङ्कर' तथा यमुना-भक्तों 
हेतु प्रस्तुत करने के  लोभ का संवरण नहीं कर पा रहा हूँ । 
                                                              
                                                                      -अरुण मिश्र   



जय यमुना मैय्या की !








श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचित
श्री यमुनाष्टकम् का भावानुवाद

-अरुण मिश्र

 मुरारि-तन-सुकालिमा  ले नीर में,   विहर रही।
 समक्ष स्वर्ग, तुल्य तृण; त्रिलोक-शोक हर रही।
 कुंज-पुंज कूल के मनोज्ञ;    मद-कलुष  विदा।
 कलिंदनंदिनी,  हमारे मन का मल  धुले सदा।।


                मल सकल  विनाशिनी;  सुनीर से  सुपूरिता।
                नंदसुत-सुअंग  संग   पा  के,    राग-रंजिता।
                प्रघोर-पाप-चोरिणी;  सदा प्रवीण;  मुक्तिदा।
                कलिंदनंदिनी,  हमारे मन का मल  धुले सदा।।


तरंग के परस से पाप,   प्राणियों  के   हर उठें।
सुभक्ति हेतु तट,  सुभक्त चातकों से भर उठें।
भक्त-रूप     कूल-हंस-सेविता;     सुकामदा।
कलिंदनंदिनी,  हमारे मन का मल  धुले सदा।।


                विहार-रास-श्रम  हरे,   समीर धीर  तीर का।
                गिरा  कहाँ बता सके,   सुचारुता  सुनीर का।
                नद-नदी-धरा  पवित्र,   पा  प्रवाह  शुचिप्रदा।
                कलिंदनंदिनी,  हमारे मन का मल  धुले सदा।।


 सुश्यामला;   तरंग संग   बालुका से  उर भरे।
 सिंगार,   रश्मि-मंजरी   शरद के चंद्र की करे।
 अर्चना   के    हेतु    चारु-नीरदा;     सुतोषदा।
 कलिंदनंदिनी,  हमारे मन का मल  धुले सदा।।


                 रम्य-राधिका-सुअंग-अंगराग    पा    खिले।
                 अंग-संग कान्ह का  न अन्य को,  इसे मिले।
                 निज  प्रवाह   सप्तसिंधु   भेदती,   शुभप्रदा।
                 कलिंदनंदिनी,  हमारे मन का मल  धुले सदा।।


कृष्ण-रंग रंगी, ले गोपियों को  भाग्यशालिनी।
राधिका-सुकेश-माल   से    हुई    है   मालिनी।
नारदादि  कृष्ण-भृत्य,    स्नान   करें   सर्वदा।
कलिंदनंदिनी,  हमारे मन का मल  धुले सदा।।


                 मंजु-कुंज   खेलते,   सदैव   नंद   के   लला।
                 मल्लिका-कदंब-रेणु से है  तट समुज्जवला।
                 स्नान नर करें, तरें वो भव-उदधि; स्वधामदा।
                 कलिंदनंदिनी,  हमारे मन का मल  धुले सदा।।

                                                          *

   (इति श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचित श्री यमुनाष्टकम् का भावानुवाद सम्पूर्ण हुआ।)


मूल संस्कृत पाठ  :


श्रीयमुनाष्टकम् 


































 

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

नाच रसीले मन !

बारिश में भीगी कुछ नन्हीं नन्हीं तीन पदों की तुकांत रचनाएँ,
क्रमशः तीन, पाँच एवं तीन के शब्द-विधान में 











नाच रसीले मन ! 

-अरुण मिश्र

ज़ोश भरे बादल।
टकराते फिरते, दल के दल;
गुँजा  रहे मादल।।
           *
घटा घिरी घनघोर।
करत शोर चहुँ ओर पपिहरा,
दादुर, कोयल, मोर।।
            *
घिर आये बादल।
विरही नयनों से छलका जल;
फिर बिखरा काजल।।
            *
पावस के घन।
रस बरसायें; छूम छनन छन,
नाच, रसीले मन!!
            *
केतिक करूँ  उपाय।
नित टकटकी बाँधि छवि निरखूँ ,
आँखिन  नाहिं समाय।।
            *
चपला घन चमके।
रस संगीत सुनावत बदरा, बरसत
हैं जम के।।
            *
सोंधी धरती महके।
भीग भीग, वन उपवन लहके;
जन जीवन चहके।।
             *
 

 

रविवार, 17 अगस्त 2014

वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् .....


 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् .....
 
भावानुवाद :
 
नवनीरद   आभायुत 
वंशीविभूषित    कर।
 
पीताम्बरधर;  अरुण 
विम्बफल सम अधर।
 
पूर्णेन्दुसुन्दर    मुख,
अरविन्द सदृश  नेत्र;
 
कृष्ण से इतर,  जानूँ 
मैं न परमतत्व अपर।। 
 
          
                              -अरुण मिश्र
 
मूल :
 
वन्शीविभूषित्करान्नवनीरदाभात
 
         पीताम्बराद  अरुणविम्बफलाधरोष्ठात 
 
पूर्णेन्दुसुन्दर्मुखारर्विन्दनेत्रात
 
         कृष्णात्परं किमपि तत्वमहम् न जाने ।।