सोमवार, 8 मई 2023

नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं.../ शम्भु स्तुति / ब्रह्म पुराण / श्री राम द्वारा की गई भगवान शिव की स्तुति / गायन : नैशा जोशी

 https://youtu.be/xaoOTKu0DSI  

लंका प्रवेश के लिए समुंद्र पर सेतु निर्माण के समय 
भगवान श्री राम ने रामेश्वरम में महादेव को प्रसन्न 
करने के लिए स्वयं शिवलिंग की स्थापना की और 
भगवान शिव का आह्वान किया था। भगवान शिव के 
लिए श्री राम ने जो स्तुति गाई थी उसे ही शम्भु स्तुति 
कहा जाता है। भगवान श्री राम द्वारा रचित इस शम्भु-
स्तुति का उल्लेख ब्रह्म पुराण में मिलता है।

नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं...

नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं नमामि सर्वज्ञमपारभावम् । नमामि रुद्रं प्रभुमक्षयं तं नमामि शर्वं शिरसा नमामि ॥१॥

मैं पुराणपुरुष शम्भु को नमस्कार करता हूँ। जिनकी असीम सत्ता का 
कहीं पार या अन्त नहीं है, उन सर्वज्ञ शिव को मैं प्रणाम करता हूँ। 
अविनाशी प्रभु रुद्र को नमस्कार करता हूँ। सबका संहार करने वाले 
शर्व को मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ।

नमामि देवं परमव्ययंतं उमापतिं लोकगुरुं नमामि । नमामि दारिद्रविदारणं तं नमामि रोगापहरं नमामि ॥२॥

अविनाशी परमदेव को नमस्कार करता हूँ। लोकगुरु उमापति को प्रणाम 
करता हूँ। दरिद्रता को विदीर्ण करने वाले शिव को नमस्कार करता हूँ। 
रोगों का विनाश करने वाले महेश्वर को प्रणाम करता हूँ।

नमामि कल्याणमचिन्त्यरूपं नमामि विश्वोद्ध्वबीजरूपम् । नमामि विश्वस्थितिकारणं तं नमामि संहारकरं नमामि ॥३॥

जिनका रूप चिन्तन का विषय नहीं है, उन कल्याणमय शिव को नमस्कार 
करता हूँ। विश्व की उत्पत्ति के बीजरूप भगवान भव को प्रणाम करता हूँ। 
जगत का पालन करने वाले परमात्मा को नमस्कार करता हूँ। संहारकारी 
रुद्र को नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ।

नमामि गौरीप्रियमव्ययं तं नमामि नित्यंक्षरमक्षरं तम् । नमामि चिद्रूपममेयभावं त्रिलोचनं तं शिरसा नमामि ॥४॥

पार्वतीजी के प्रियतम अविनाशी प्रभु को नमस्कार करता हूँ। 
नित्यक्षर-अक्षरस्वरूप शंकर को प्रणाम करता हूँ। जिनका स्वरूप चिन्मय 
है और अप्रमेय है, उन भगवान त्रिलोचन को मैं मस्तक झुकाकर बारम्बार 
नमस्कार करता हूँ।

नमामि कारुण्यकरं भवस्या भयंकरं वापि सदा नमामि । नमामि दातारमभीप्सितानां नमामि सोमेशमुमेशमादौ ॥५॥

करुणा करने वाले भगवान शिव को प्रणाम करता हूँ तथा संसार को भय देने 
वाले भगवान भूतनाथ को सर्वदा नमस्कार करता हुँ। मनोवांछित फलों के दाता 
महेशवर को प्रणाम करता हूँ। भगवती उमा के स्वामी श्रीसोमनाथ को नमस्कार 
करता हूँ।

नमामि वेदत्रयलोचनं तं नमामि मूर्तित्रयवर्जितं तम् । नमामि पुण्यं सदसद्व्यातीतं नमामि तं पापहरं नमामि ॥६॥

तीनों वेद जिनके तीन नेत्र हैं, उन त्रिलोचन को प्रणाम करता हूँ। त्रिविध मूर्ति 
से रहित सदाशिव को नमस्कार करता हूँ। पुण्यमय शिव को प्रणाम करता हूँ। 
सत्-असत् से पृथक् परमात्मा को नमस्कार करता हूँ। पापों को नष्ट करने वाले 
भगवान हर को प्रणाम करता हूँ।

नमामि विश्वस्य हिते रतं तं नमामि रूपापि बहुनि धत्ते । यो विश्वगोप्ता सदसत्प्रणेता नमामि तं विश्वपतिं नमामि ॥७॥

जो विश्व के हित में लगे रहते हैं, बहुत-से रूप धारण करते हैं, उन भगवान शंकर 
को मैं प्रणाम करता हूँ। जो संसार के रक्षक तथा सत् और असत् के निर्माता हैं, 
उन विश्वपति (भगवान् विश्वनाथ ) को मैं नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ।

यज्ञेश्वरं सम्प्रति हव्यकव्यं तथागतिं लोकसदाशिवो यः । आराधितो यश्च ददाति सर्वं नमामि दानप्रियमिष्टदेवम् ॥८॥

हव्य-कव्य स्वरूप यज्ञेश्वर को नमस्कार करता हूँ। सम्पूर्ण लोकों का सर्वदा 
कल्याण करने वाले जो भगवान शिव आराधना करने पर उत्तम गति एवं 
सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं, उन दानप्रिय इष्टदेव को मैं नमस्कार 
करता हूँ।

नमामि सोमेश्वरंस्वतन्त्रं उमापतिं तं विजयं नमामि । नमामि विघ्नेश्वरनन्दिनाथं पुत्रप्रियं तं शिरसा नमामि ॥९॥

भगवान सोमनाथ को प्रणाम करता हूँ। जो स्वतन्त्र न रहकर भक्तों के वश 
रहते हैं, उन विजयशील उमानाथ को मैं नमस्कार करता हूँ। विघ्नराज गणेश 
तथा नन्दी के स्वामी पुत्रप्रिय भगवान् शिव को मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम 
करता हूँ।

नमामि देवं भवदुःखशोक विनाशनं चन्द्रधरं नमामि । नमामि गंगाधरमीशमीड्यं उमाधवं देववरं नमामि ॥१०॥

संसार के दुःख और शोक का नाश करने वाले देवता भगवान चन्द्रशेखर को 
मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ। जो स्तुति करने योग्य और मस्तक पर गंगा जी 
को धारण करने वाले हैं, उन महेश्वर को नमस्कार करता हूँ। देवताओं में श्रेष्ठ 
उमापति को प्रणाम करता हूँ।

नमाम्यजादीशपुरन्दरादि सुरासुरैरर्चितपादपद्मम् । नमामि देवीमुखवादनानां ईक्षार्थमक्षित्रितयं य ऐच्छत् ॥११॥

सभी देवता जिनके चरण-कमलों की पूजा करते हैं, उन भगवान को मैं नमस्कार 
करता हूँ। जिन्होंने पार्वतीदेवी के मुख से निकलने वाले वचनों पर दृष्टिपात करने 
की इच्छा से मानो तीन नेत्र धारण कर रखे हैं, उन भगवान को प्रणाम करता हूँ।
पंचामृतैर्गन्धसुधूपदीपैः

विचित्रपुष्पैर्विविधैश्च मन्त्रैः । अन्नप्रकारैः सकलोपचारैः सम्पूजितं सोममहं नमामि ॥१२॥

पंचामृत, चन्दन, उत्तम धूप, दीप, भाँति-भाँति के विचित्र पुष्प, मन्त्र तथा अन्न आदि 
समस्त उपचारों से पूजित भगवान सोम को में नमस्कार करता हूँ।

॥ इति श्रीब्रह्ममहापुराणे शम्भुस्तुतिः सम्पूर्णा॥

रविवार, 7 मई 2023

नटवर नंदलाल गिरधारी दयि द चीर हमारी नाय.../ कजरी / गायन : अंजू उपाध्याय 'अमृत'

 https://youtu.be/dsu8OfaVJ_Q  

नटवर नंदलाल गिरधारी दयि द चीर हमारी नाय...

नटवर नंदलाल गिरधारी,
दयि द चीर हमारी नाय। 
नटवर नंदलाल गिरधारी,
दयि द चीर हमारी नाय ,

दयि द चीर हमारी नाय, 
दयि द चीर हमारी नाय,
यशोदा नन्द लाल गिरधारी, 
दयि द चीर हमारी नाय। 

यशोदा नन्द लाल गिरधारी, 
दयि द चीर हमारी नाय।  

चीर चुराय कदम्ब चढ़ि बैठे,
चीर चुराय कदम्ब चढ़ि बैठे,
चीर चुराय कदम्ब चढ़ि बैठे,
हम जल माँझ उघारी नाय। 

नटवर नंदलाल गिरधारी,
दयि द चीर हमारी नाय। 
यशोदा नन्द लाल गिरधारी, 
दयि द चीर हमारी नाय।।

यशोदा नन्द लाल गिरधारी, 
दयि द चीर हमारी नाय।।

तोहरिन चीर तबय हम देबय,
तोहरिन चीर तबय हम देबय,
तोहरिन चीर तबय हम देबय,
जब तूं जल से न्यारी नाय।
नटवर नंदलाल गिरधारी,
दयि द चीर हमारी नाय।  
यशोदा नन्द लाल गिरधारी, 
दयि द चीर हमारी नाय।। 

यशोदा नन्द लाल गिरधारी, 
दयि द चीर हमारी नाय।। 

पुरइन पात पहिरि राधा निकलीं,
पुरइन पात पहिरि राधा निकलीं,
पुरइन पात पहिरि राधा निकलीं,
कृष्ण बजावें ताली नाय। 
नटवर नंदलाल गिरधारी,
दयि द चीर हमारी नाय।  
यशोदा नन्द लाल गिरधारी, 
दयि द चीर हमारी नाय।। 

बइठ्या जाइ कदम की डारी,
बइठ्या जाइ कदम की डारी, 
दयि द चीर हमारी नाय।। 

यशोदा नन्द लाल गिरधारी, 
दयि द चीर हमारी नाय।। 

शनिवार, 6 मई 2023

जाने बलमा घोड़े पे क्यों सवार है.../ गायन : शिरीषा भागवातुला

 https://youtu.be/2i59Ui53JYE   

जाने बलमा घोड़े पे क्यों सवार है... 
फिल्म : कला (२०२२)
गीत : अमिताभ भट्टाचार्य 
संगीत : अमित त्रिवेदी 
गायन : शिरीषा भागवातुला 

कोई कैसे उन्हें ये समझाए
सजनिया के मन में अभी इंकार है
जाने बलमा घोड़े पे क्यों सवार है
जाने बलमा घोड़े पे क्यों सवार है

धीरे धीरे जतन करने से
दुल्हनिया के खुलते हृदय के द्वार हैं 
जाने बलमा घोड़े पे क्यों सवार है
जाने बलमा घोड़े पे क्यों सवार है

बालो में बढ़ के गजरा लगाना
नज़दीक आने का है बहाना
सब जान के भी, छलिया के छल से
मुश्किल है बच पाना
ओह, 
अखियों से ठग के, 
भरना वो जाने 
बतियों से जुर्माना

हाँ, 
जो मैं टोकूं, कहा ना मेरा माने 
भवों को ऐसे ताने
बहस बेकार है 
जाने बलमा घोड़े पे क्यों सवार है
जाने बलमा घोड़े पे क्यों सवार है

कोई कैसे उन्हें ये समझाए
सजनिया के मन में अभी इंकार है
जाने बलमा घोड़े पे क्यों सवार है
जाने बलमा घोड़े पे क्यों सवार है

शुक्रवार, 5 मई 2023

चंदन चर्चित नील कलेवर.../ गीत गोविंद अष्टपदी / महाकवि जयदेव गोस्वामी विरचित

https://youtu.be/Vpn1UTRmISI

चन्दन चर्चित नील कलेवर...

चन्दनचर्चितनीलकलेवरपीतवसनवनमाली ।
केलिचलन्मणिकुण्डलमण्डितगण्डयुगस्मितशाली ॥
हरिरिहमुग्धवधूनिकरे
विलासिनि विलसति केलिपरे ॥ १॥

अनुवाद- हे विलासिनी श्रीराधे! देखो! पीतवसन धारण किये हुए, 
अपने तमाल-श्यामल-अंगो में चन्दन का विलेपन करते हुए, 
केलिविलासपरायण श्रीकृष्ण इस वृन्दाविपिन में मुग्ध वधुटियों के 
साथ परम आमोदित होकर विहार कर रहे हैं, जिसके कारण 
दोनों कानों में कुण्डल दोलायमान हो रहे हैं, उनके कपोलद्वय 
की शोभा अति अद्भुत है। मधुमय हासविलास के द्वारा 
मुखमण्डल अद्भुत माधुर्य को प्रकट कर रहा है ॥१॥

पीनपयोधरभारभरेण हरिं परिरम्य सरागम् ।
गोपवधूरनुगायति काचिदुदञ्चितपञ्चमरागम् ॥
हरिरिह...॥२॥

अनुवाद- देखो सखि! वह एक गोपांगना अपने पीनतर पयोधर-युगल के 
विपुल भार को श्रीकृष्ण के वक्षस्थल पर सन्निविष्टकर प्रगाढ़ अनुराग के 
साथ सुदृढ़रूप से आलिंगन करती हुई उनके साथ पञ््चम स्वर में गाने 
लगती है ॥२॥

कापि विलासविलोलविलोचनखेलनजनितमनोजम् ।
ध्यायति मुग्धवधूरधिकं मधुसूदनवदनसरोजम् ॥
हरिरिह...॥ ३॥

अनुवाद- देखो सखि! श्रीकृष्ण जिस प्रकार निज अभिराम मुखमण्डलकी श्रृंगार 
रस भरी चंचल नेत्रों की कुटिल दृष्टि से कामिनियों के चित्त में मदन विकार करते 
हैं, उसी प्रकार यह एक वरांगना भी उस वदनकमल में अश्लिष्ट (संसक्त) मकरन्द 
पान की अभिलाषा से लालसान्वित होकर उन श्रीकृष्ण का ध्यान कर रही है ॥३॥

कापि कपोलतले मिलिता लपितुं किमपि श्रुतिमूले ।
चारु चुचुम्ब नितम्बवती दयितं पुलकैरनुकूले ॥
हरिरिह...॥ ४॥

अनुवाद- वह देखो सखि! एक नितम्बिनी (गोपी) ने अपने प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण के 
कर्ण (श्रुतिमूल) में कोई रहस्यपूर्ण बात करने के बहाने जैसे ही गण्डस्थल पर मुँह 
लगाया तभी श्रीकृष्ण उसके सरस अभिप्राय को समझ गये और रोमाञ्चित हो उठे। 
पुलकाञ्चित श्रीकृष्ण को देख वह रसिका नायिका अपनी मनोवाञ्छा को पूर्ण करने 
हेतु अनुकूल अवसर प्राप्त करके उनके कपोल को परमानन्द में निमग्न हो चुम्बन 
करने लगी ॥४॥

केलिकलाकुतुकेन च काचिदमुं यमुनाजलकूले ।
मञ्जुलवञ्जुलकुञ्जगतं विचकर्ष करेण दुकूले ॥
हरिरिह...॥ ५॥

अनुवाद- सखि! देखो, यमुना पुलिन पर मनोहर वेतसी (वञ्जुल या वेंत)
कुञ्ज में किसी गोपी ने एकान्त पाकर कामरस वशवर्त्तिनी हो क्रीड़ाकला 
कौतूहल से उनके वस्त्रयुगल को अपने हाथों से पकड़कर खींच लिया ॥५॥


करतलतालतरलवलयावलिकलितकलस्वनवंशे ।
रासरसे सह नृत्यपरा हरिणा युवतिः प्रशशंसे ॥
हरिरिह...॥६॥

अनुवाद- हाथों की ताली के तान के कारण चञ्चल कंगण-समूह से अनुगत 
वंशीनाद से युक्त अद्भुत स्वर को देखकर श्रीहरि रासरस में आनन्दित 
नृत्य-परायणा किसी युवती की प्रशंसा करने लगे ॥६॥

श्लिष्यति कामपि चुम्बति कामपि कामपि रमयति रामाम् ।
पश्यति सस्मितचारुतरामपरामनुगच्छति वामाम् ॥
हरिरिह...॥ ७॥

अनुवाद- श्रृंगार-रस की लालसा में श्रीकृष्ण कहीं किसी रमणी का
आलिंगन करते हैं, किसी का चुम्बन करते हैं, किसी के साथ रमण 
कर रहे हैं और कहीं मधुर स्मित सुधा का अवलोकन कर किसी को 
निहार रहे हैं तो कहीं किसी मानिनी के पीछे-पीछे चल रहे हैं ॥७॥

श्रीजयदेवकवेरिदमद्भुतकेशवकेलिरहस्यम् ।
वृन्दावनविपिने ललितं वितनोतु शुभानि यशस्यम् ॥
हरिरिह...॥ ८॥

अनुवाद- श्रीजयदेव कवि द्वारा रचित यह अद्भुत मंगलमय ललित गीत 
सभी के यश का विस्तार करे। यह शुभद गीत श्रीवृन्दावन के विपिन विहार 
में श्रीराधा जी के विलास परीक्षण एवं श्रीकृष्ण के द्वारा की गयी अद्भुत 
कामक्रीड़ा के रहस्य से सम्बन्धित है। यह गान वन बिहारजनित सौष्ठव को 
अभिवर्द्धित करने वाला है॥८॥

बुधवार, 3 मई 2023

तोटकाष्टकम् .../ आदि शंकराचार्य के शिष्य तोटकाचार्य रचित / स्वर : अक्षरा संस्कृति

 https://youtu.be/FliycbYpYg0  

तोटकाष्टकम् 

विदिताखिलशास्त्रसुधाजलधे 
महितोपनिषत् कथितार्थनिधे । 
हृदये कलये विमलं चरणं 
भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ १॥

हे पवित्रशास्त्र रूपी सागर के पारखी! महान उपनिषदिक खजाने के प्रदर्शक!
आपके निर्दोष चरणों में मैं अपने हृदय से ध्यान करता हूँ, हे गुरु, शंकर, मुझे 
शरण दीजिये! 
॥ १॥

करुणावरुणालय पालय मां
भवसागरदुःखविदूनहृदम् । 
रचयाखिलदर्शनतत्त्वविदं 
भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ २॥ 

हे करुणा का सागर! मुझे भवसागर से बचा लो, जिसका हृदय इस मृत्यु लोक 
पर जन्म के दुख से तड़प रहा है! मुझे दर्शनशास्त्र के सभी तत्वों की सच्चाइयों 
को समझाओ!मुझे अपनी शरण दीजिये, हे गुरु, शंकर। ॥ २॥ 

भवता जनता सुहिता भविता 
निजबोधविचारण चारुमते । 
कलयेश्वरजीवविवेकविदं 
भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ ३॥ 

आपने सम्पूर्ण जगत को खुश किया है, हे महान बुद्धि वाले, आत्म-ज्ञान की खोज 
में कुशल! मुझे ईश्वर और आत्मा से संबंधित ज्ञान को समझने दो। मेरी शरण बनिए, 
हे गुरु, शंकर। 
॥ ३॥ 

भव एव भवानिति मे नितरां 
समजायत चेतसि कौतुकिता । 
मम वारय मोहमहाजलधिं 
भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ ४॥

यह जानकर कि आप वास्तव में जगद्गुरु हैं, मेरे हृदय में अपार आनंद उत्पन्न होता है।
मोह के विशाल महासागर से मेरी रक्षा करो। हे गुरु, शंकर, ,मुझे अपनी शरण 
में लीजिये। 
॥ ४॥

सुकृतेऽधिकृते बहुधा भवतो 
भविता समदर्शनलालसता । 
अतिदीनमिमं परिपालय मां 
भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ ५॥

आपके माध्यम से एकता में अंतर्दृष्टि की कामना तभी जन्म लेगी जब पुण्य कर्म 
बहुतायत में और विभिन्न दिशाओं में किए जाएंगे। इस अत्यंत असहाय व्यक्ति की 
रक्षा करें। हे गुरु, शंकर,मुझे अपनी शरण में लीजिये। 
॥ ५॥

जगतीमवितुं कलिताकृतयो 
विचरन्ति महामहसश्छलतः । 
अहिमांशुरिवात्र विभासि गुरो 
भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ ६॥

विश्व को बचाने के लिए महान व्यक्ति विभिन्न रूप धारण करते हैं और अनेकों भेष 
बनाकर घूमते हैं। हे शिक्षक! आप उनमें से भी सूर्य के समान चमकते है। अतः आप 
मेरा आश्रय बने, हे गुरु, शंकर। 
॥ ६॥

गुरुपुंगव पुंगवकेतन ते 
समतामयतां नहि कोऽपि सुधीः । 
शरणागतवत्सल तत्त्वनिधे 
भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ ७॥

हे श्रेष्ठ गुरु! हे सर्वोच्च गुरु आपके पास वृषध्वज है! कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति आपके 
समान नहीं है! हे! शरणागत वत्सल! हे! सत्यरूपी निधी मुझे अपनी शरण दीजिये। हे 
गुरु शंकर। 
॥ ७॥

विदिता न मया विशदैककला 
न च किंचन काञ्चनमस्ति गुरो ।
द्रुतमेव विधेहि कृपां सहजां
भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ ८॥

मैं अल्पज्ञानी ज्ञान की एक शाखा भी नहीं समझ नहीं पाता हूँ, मुझ निर्धन के पास 
सम्पति भी नहीं है अर्थात में धन और ज्ञान दोनों रूपों से निर्धन हूँ। अतः हे गुरुदेव मुझे 
अपनी ममतामयी छाया में आश्रय दीजिये, मेरी शरण बनिये, हे गुरु शंकर। ॥ ८॥

मंगलवार, 2 मई 2023

यह बिनती रघुबीर गुसाईं.../ गोस्वामी तुलसीदास / गायन : शाल्मली जोशी

 https://youtu.be/v8LqtKT_Tow   

यह बिनती रघुबीर गुसाईं...

गोस्वामी तुलसीदास कृत 
विनय-पत्रिका पद सं0- १०३
यह बिनती रघुबीर गुसाईं ।
और आस-बिस्वास-भरोसो, हरो जीव-जड़ताई ॥ १ ॥

चहौं न सुगति, सुमति, संपति कछु, रिधि-सिधि बिपुल बड़ाई ।
हेतु-रहित अनुराग राम-पद, बढ़ै अनुदिन अधिकाई ॥ २ ॥

कुटिल करम लै जाहिं मोहि, जहँ-जहँ अपनी बरिआई ।
तहँ तहँ जनि छिन छोह छाँड़ियो, कमठ-अंडकी नाईं ॥ ३ ॥

या जग मेँ जहँ लगि या तनु की, प्रीति-प्रतीति-सगाई ।
ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों, होहिं सिमिटि इक ठाईं ॥ ४ ॥


अर्थ 
हे रघुनाथ जी ! हे नाथ ! मेरी विनती है कि इस जीवको दुसरे 
साधन, देवता या कर्मोंपर जो आशा, विश्वास और भरोसा है, 
उस मूर्खता को आप हर लीजिये ॥१॥

हे राम ! मैं शुभगति, सद्बुद्धि, धन-संपत्ति, ऋद्धि-सिद्धि और 
बड़ी भारी बड़ाई आदि कुछ भी नहीं चाहता. बस, मेरा तो 
आपके चरण-कमलोंमें दिनोंदिन अधिक-से-अधिक अनन्य 
और विशुद्ध प्रेम बढ़ता रहे, यही चाहता हूँ ॥२॥

मुझे अपने बुरे कर्म जबरदस्ती जिस-जिस योनि में ले जाएँ, 
उस-उस योनिमें ही हे नाथ ! जैसे कछुआ अपने अण्डों को 
नहीं छोड़ता, वैसे ही आप पलभर के लिए भी अपनी कृपा 
न छोड़ना ॥३॥

हे नाथ ! इस संसारमें जहां तक इस शरीरका (स्त्री-पुत्र-
परिवारादिसे) प्रेम, विश्वास और सम्बन्ध है, सो सब एक ही 
स्थान पर सिमटकर केवल आपसे ही हो जाय ॥४॥

सोमवार, 1 मई 2023

अपनी तबाहियों का किसी से गिला नहीं.../ शायरा मोहतरमा बरखा रानी

 https://youtu.be/WdQRvfMfwWM  

अपनी तबाहियों का किसी से गिला नहीं
ये वारदात सिर्फ मेरा वाक़या नहीं

इस शहर के हुजूम में गुम हो गए हैं लोग
आवाज़ दे रही हूँ कोई बोलता नहीं

हमने फ़िराक-ए-यार में घड़ियाँ गुज़ार दी
इस मरहले के बाद कोई मरहला नहीं

ये आपका है हुक्म तो अच्छा यूँही सही
तर्के-तअल्लुकात मेरा मुद्दआ नहीं

यूँ खो गई हूँ रंज-ओ-अलम के गुबार में
मंजिल तो सामने है मगर रास्ता नहीं
*
(वाक़या = घटना / फ़िराक = वियोग, विरह /
मरहला = समस्या / रंज-ओ-अलम = दुःख, पीड़ा)