रविवार, 10 अप्रैल 2011

दर्दे-दिल से जो घबराइए...


ग़ज़ल 
-अरुण मिश्र.

( टिप्पणी : आडिओ क्लिप में, इस ग़ज़ल को स्वर दिया है शकील मियां ने
एवं संगीत रचना उस्ताद जमील रामपुरी की है| रिकार्डिंग वर्ष २००३ की है| )

दर्दे-दिल से जो घबराइये।  
जाइये तो कहाँ जाइये।।
 
कोई साया घना खोजिये।  
या इधर मेरे पास आइये।।
 
आशिक़ी में ये तहज़ीब है।  
मुस्करा कर जहर खाइये।।
 
कुछ न आते , न जाते बने।  
यूँ कहे वो कि, आ-जाइये।।
 
है ग़मे-इश्क़ का क्या इलाज।  
पालिये , और पछताइये।।
 
कुछ दवायें न कामआयेंगी।  
अब दुआओं पे दिल लाइये।।
 
बस के आँखों में जी न भरे।  
तो दिलों में उतर जाइये।।
 
है ‘अरुन’ ये ग़ज़ल प्यार की।  
नाज़ुकी से इसे गाइये।।  
* 
 






सोमवार, 4 अप्रैल 2011

नव-संवत्सर की हार्दिक शुभकामनायें !




















"जीवन में फिर से रस घोले, जीवन जीने का उछाह हो|
 नव-संवत्सर नई ख़ुशी दे, जीवन में  कुछ नई राह हो||"




रश्मि-रेख के सभी अतिथियों, आगंतुकों, शुभचिंतकों, समर्थकों एवं सन्मित्रों को नव-संवत्सर की हार्दिक शुभकामनायें !!!


- अरुण मिश्र.

गुरुवार, 24 मार्च 2011

अंकुर तुम बनो आम्र वृक्ष...

अंकुर तुम बनो आम्र वृक्ष...  




















( टिप्पणी : प्रिय पुत्र चिरंजीव अंकुर  की पहली 
  वर्ष गाँठ पर लिखी यह कविता, आज उसके 
  जन्म दिवस पर ब्लागार्पित कर रहा हूँ | यह 
  आशीर्वाद हर पिता की ओर से,हर पुत्र को मिले | 
  मेरे काव्य संग्रह 'अंजलि भर भाव के प्रसून ' से 
  साभार |  - अरुण मिश्र.)


- अरुण मिश्र 






















































 
              



 ***

रविवार, 20 मार्च 2011

चलो रे! खेलें फाग; होली है...

चलो रे! खेलें फाग; होली है... 


-अरुण  मिश्र 
   
चलो रे! खेलें फाग; होली है।
          
          सगरो  ब्रज में,  धूम  मची है;
          लोक-लाज, कछु नाय बची है;

इत राधा,सखियन संग निकसीं,
उत, नंदलाल  की  टोली  है।
चलो रे! खेलें फाग; होली है।।
 
              नव  वसंत   कै,  बाजै   नूपुर;
         लहरै  सरजू, उमगै  अवधपुर;
 
चलीं सीय, सखियन संग उतहीं,
जित, रघुवीर  की  टोली  है।
चलो रे! खेलें फाग; होली है।।
 
          धूम मची, कैलास-सिखर पर,
        नाचें  सिव-गनेस, डमरू-स्वर
 
सुनि गौरा, सखियन संग धाईं,
बम-भोले की भागी, टोली है।
चलो रे! खेलें फाग; होली है।। 
                                   *

शनिवार, 19 मार्च 2011

होरी की भोर में नन्द-किसोर ने...




कवित्त

-अरुण मिश्र 

होरी की भोर में, नन्द-किसोर ने, 
लाग्यो है  कीन्ही, बिसेस तयारी।
झोरी   अबीर   की,   कॉधे   धरी, 
अरु  हाथ लई है,  नई पिचकारी।
पातन बीच  लुकाइ के, घात सों, 
गोरी  पे,  रंग  की  धार  जु डारी।
कॉकरि  मारी,  न  गागरि फोरी, 
अचंभित राधा, भिजी कत सारी।।
                    * 





शुक्रवार, 18 मार्च 2011

झूम उठ्यो सगरो ब्रज मंडल...



कवित्त 

-अरुण मिश्र 

झूम  उठ्यो  सगरो  ब्रज  मंडल, 
होरी  कै  धूम - धमाल  भयो  है।
कारे-कन्हैया   पे   दूजो   है  रंग  
चढ़्यो, यहु खूब कमाल भयो है।
राधा  के   रंग  में   स्याम   रंगे, 
अरु राधेहु कै अस हाल  भयो है।
कान्हा  के  हाथ   लगे  न  अबै, 
तबहूँ  कस गाल गुलाल भयो है।।
                    *

गुरुवार, 17 मार्च 2011

हे री! सखी...




कवित्त

-अरुण  मिश्र

हे री! सखी, इन ऑखिन सम्मुख, 
होरी  तो,   सोरह  साल   जर्-यो है। 
पै री! सखी, यहि बार की होरी,न 
पूछौ  कुछौ, जस  हाल   कर्-यो है।
चैन उड़्यो दिन कौ,निसि नींद न, 
ऑखिन  डोरो  जु  लाल  पर्-यो है।
पूछैं  सबै,  तौ  बहानो  करौं, उड़ि 
ऑखिन  आय  गुलाल   पर्-यो है।।
                    *