मंगलवार, 18 जनवरी 2022

मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे.../ अहमद फ़राज़

 https://youtu.be/ZMl5b4ty4lI 

अहमद फ़राज़ (१९३१- २००८), असली नाम सैयद अहमद शाह, 
का जन्म पाकिस्तान के नौशेरां शहर में हुआ था। वे आधुनिक उर्दू के 
सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने पेशावर विश्वविद्यालय में 
फ़ारसी और उर्दू विषय का अध्ययन किया था। बाद में वे वहीं प्राध्यापक 
भी हो गए थे। अहमद फ़राज़ ने रेडियो पाकिस्तान में भी नौकरी की और 
फिर अध्यापन से भी जुड़े। उनकी प्रसिद्धि के साथ-साथ उनके पद में भी 
वृद्धि होती रही। वे १९७६ में पाकिस्तान एकेडमी ऑफ लेटर्स के डायरेक्टर 
जनरल और फिर उसी एकेडमी के चेयरमैन भी बने। २००४ में पाकिस्तान 
सरकार ने उन्हें हिलाल-ए-इम्तियाज़ पुरस्कार से अलंकृत किया। लेकिन 
२००६ में उन्होंने यह पुरस्कार इसलिए वापस कर दिया कि वे सरकार की 
नीति से सहमत और संतुष्ट नहीं थे। उनकी शायरी के कई संग्रह प्रकाशित 
हुए। ग़ज़लों के साथ ही उन्होंने नज़्में भी लिखी। लेकिन लोग उनकी ग़ज़लों 
के दीवाने हैं।

25 अगस्त 2008 को किडनी फेल होने के कारण उनका निधन हो गया।

भले दिनों की बात है
भली सी एक शक्ल थी
न ये कि हुस्न-ए-ताम हो
न देखने में आम सी
न ये कि वो चले तो कहकशां सी रहगुज़र लगे
मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे

कोई भी रुत हो उस की छब
फ़ज़ा का रंग-रूप थी
वो गर्मियों की छांव थी
वो सर्दियों की धूप थी

न मुद्दतों जुदा रहे
न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो
न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद
न ये कि इज़्न-ए-आम हो

न ऐसी ख़ुश-लिबासियां
कि सादगी गिला करे
न इतनी बे-तकल्लुफ़ी
कि आइना हया करे

न इख़्तिलात में वो रम
कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें
न इस क़दर सुपुर्दगी
कि ज़च करें नवाज़िशें
न आशिक़ी जुनून की
कि ज़िंदगी अज़ाब हो
न इस क़दर कठोर-पन
कि दोस्ती ख़राब हो

कभी तो बात भी ख़फ़ी
कभी सुकूत भी सुख़न
कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़रां
कभी उदासियों का बन

सुना है एक उम्र है
मुआमलात-ए-दिल की भी
विसाल-ए-जां-फ़ज़ा तो क्या
फ़िराक़-ए-जां-गुसिल की भी

सो एक रोज़ क्या हुआ
वफ़ा पे बहस छिड़ गई
मैं इश्क़ को अमर कहूं
वो मेरी ज़िद से चिड़ गई

मैं इश्क़ का असीर था
वो इश्क़ को क़फ़स कहे
कि उम्र भर के साथ को
वो बद-तर-अज़-हवस कहे

शजर हजर नहीं कि हम
हमेशा पा-ब-गिल रहें
न ढोर हैं कि रस्सियां
गले में मुस्तक़िल रहें

मोहब्बतों की वुसअतें
हमारे दस्त-ओ-पा में हैं
बस एक दर से निस्बतें
सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं

मैं कोई पेंटिंग नहीं
कि इक फ़्रेम में रहूं
वही जो मन का मीत हो
उसी के प्रेम में रहूं

तुम्हारी सोच जो भी हो
मैं उस मिज़ाज की नहीं
मुझे वफ़ा से बैर है
ये बात आज की नहीं

न उस को मुझ पे मान था
न मुझ को उस पे ज़ोम ही
जो अहद ही कोई न हो
तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी
सो अपना अपना रास्ता
हंसी-ख़ुशी बदल दिया
वो अपनी राह चल पड़ी

मैं अपनी राह चल दिया
भली सी एक शक्ल थी
भली सी उस की दोस्ती
अब उस की याद रात दिन
नहीं, मगर कभी कभी

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