बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

ग़ज़ल

तो ये पत्थर हैं ख़दानों में मिला करते हैं


- अरुण मिश्र  


दश्त-ओ-सह्रा   में  भी  चुपचाप  खिला करते हैं |
ग़ुल कहाँ , किस के तगाफुल  का गिला करते हैं??

हज़ार  साल    भी    नर्गिस   कहाँ   मायूस   हुई |
दीदावर, हुस्न  को   तय  है  कि, मिला करते हैं ||

कोई समझे न ग़र,  इन हीरों की असली कीमत|
तो   ये  पत्थर  हैं,  ख़दानों  में   मिला  करते  हैं ||  
                                    *


4 टिप्‍पणियां:

  1. हज़ार साल भी नर्गिस कहाँ मायूस हुई |
    दीदावर, हुस्न को तय है कि, मिला करते हैं ||


    --बहुत खूब!!

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  2. फितरत-ऐ-तगाफुल बसी रग रग में ज़माने की
    चाहत-ऐ-अमित कि छूटे ना तफ़ज्जुल गुल की

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  3. हज़ार साल भी नर्गिस कहाँ मायूस हुई |
    दीदावर, हुस्न को तय है कि, मिला करते हैं ||

    कोई समझे न ग़र, इन हीरों की असली कीमत|
    तो ये पत्थर हैं, ख़दानों में मिला करते हैं ||
    *

    Bahut hi achchha bhaawman sandesh. Thanks

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  4. प्रिय समीर जी एवं आदरणीय डॉ.तिवारी जी,सहृदयता के लिए धन्यवाद|
    प्रिय अमित जी,आपकी चाहत भरी दुआ का शुक्रगुजार हूँ|आपने एक उम्दा शेर' कहा है|
    - अरुण मिश्र.

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