रविवार, 3 जुलाई 2022

जय जय हे भगवति सुरभारति.../ रचना : डॉ. हरिराम आचार्य / निरालम्ब पूर्ण चक्रासन योग नृत्य / प्रस्तुति : रिया पलादिआ

 https://youtu.be/zFOpl-TWKzg

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जय जय हे भगवति सुरभारति
तव चरणौ प्रणमाम: ।
नादब्रह्ममयि जय वागीश्वरि
शरणं ते गच्छाम: ॥

त्वमसि शरण्या त्रिभुवनधन्या
सुर-मुनि-वन्दित-चरणा
नवरसमधुरा कवितामुखरा
स्मित-रुचि-रुचिराभरणा ॥

आसीना भव मानसहंसे
कुन्द-तुहिन-शशि-धवले
हर जडतां कुरु बोधिविकासं
सित-पङ्कज-तनु-विमले ॥

ललितकलामयि ज्ञानविभामयि
वीणा-पुस्तक-धारिणी

मतिरास्तां नो तव पदकमले
अयि कुण्ठाविषहारिणि ॥

यह वाणी (सरस्वती) की प्रार्थना का गीत है। यह सरल और रसयुक्त प्रार्थना का गीत कवियों में श्रेष्ठ डॉ. हरिराम आचार्य द्वारा रचा गया है। सन् 1966 ईस्वी वर्ष में रचित यह गीत वसन्तबहार राग में निबद्ध ‘मधुच्छन्दा’ नाम के ग्रन्थ से संकलित और लोक में सुप्रसिद्ध वास्तव में कवि की आदि (प्रथम) गीत-रचना थी क्योंकि जो बहुत जगह पर प्रकाशित, आकाशवाणी और दूरदर्शन से बहुत दिनों तक प्रसारित और प्रचारित की गई।

मूलपाठ एवं हिन्दी-अनुवाद 

जय जय हे भगवति सुरभारति! तव चरणौ प्रणमामः।
नाद-ब्रह्ममयि जय वागीश्वरि! शरणं ते गच्छामः ॥ १ ॥

हिन्दी-अनुवाद 
हे देवी, सरस्वती तुम्हारी जय हो (हम) तुम्हारे चरणों में प्रणाम करते हैं। हे शब्द-ब्रह्ममयी वाणी की स्वामिनी (हम) आपकी शरण में जाते हैं।

त्वमसि शरण्या त्रिभुवनधन्या, सुर-मुनि-वन्दित-चरणी।
नवरस-मधुरा कविता-मुखरा, स्मित-रुचि-रुचिराभरणा ॥ २ ॥

हिन्दी-अनुवाद
(हे देवी) तुम आश्रय प्रदान करने वाली, तीनों लोकों में श्रेष्ठ, देवों और मुनियों द्वारा जिसके चरणों की वन्दना की जाती है, श्रृंगार आदि नौ काव्य रसों से माधुर्यमयी, कविता के माध्यम से व्यक्त होने वाली, मधुर मुस्काने वाली तथा सुन्दर आभूषणों से युक्त हो।

आसीना भव मानस-हंसे, कुन्द-तुहिने-शशि-धवले!
हर जडतां कुरु बोधि-विकास, सित-पङ्कज-तनु-विमले! ॥ ३॥

हिन्दी-अनुवाद
हे चमेली, बर्फ और चन्द्रमा के समान शुभ्र, श्वेत कमल के समान निर्मल शरीर वाली (देवी सुर भारती) तुम मानसरोवर के राजहंस पर अर्थात् मेरे हृदयरूपी हंस पर विराजें, मूर्खता को हरें (दूर करो) तथा ज्ञान का विकास करो।

ललित-कलामयि, ज्ञान-विभामयि, वीणा-पुस्तक-धारिणि!
मतिरास्तान्नो तव पद-कमले अयि कुण्ठा-विष हारिणि! ॥४॥

हिन्दी-अनुवाद
हे ललित कलाओं से युक्त, ज्ञान की कान्ति (चमक) से युक्त, वीणा तथा पुस्तक धारण करने वाली, हे कुण्ठारूपी जहर को दूर करने वाली (मेरी यही प्रार्थना है कि) मेरी बुद्धि सदैव आपके चरण-कमल में लगी रहे।

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