शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

रंग ही रंग बनाया .../ पंजाबी लोकगीत / बुल्ले शाह / स्वर : कुतले खान

 https://youtu.be/9sPCJD6AN48 

"RANG HI RANG BANAYA", is a devotional Sufi song sung by Kutle Khan.

The composition of this song is based on Raag Bhairavi.

रंग ही रंग बनाया (पंजाबी लोकगीत)
रचना : बुल्ले शाह
स्वर : कुतले खान

बुल्ले शाह 

इक दिन गया मैं इश्क़ दे महकमे
इश्क़ ने मेरी वड्डाई लुट ली
मैं तो गयो इश्क़ की दाद लेने
इश्क़ ने मेरी धानाई लुट ली
इश्क़ पीर पैग़म्बरां नु लुट लहंदा
वड्डे बादशाह दी बादशाही लुट ली
ए नादान बुल्ल्या, इश्क़ ने तेरा की लुट्टया
इश्क़ ने तो ख़ुदा की ख़ुदाई लुट ली
अंत बहर दी, कल न काईं
रंगी रंग बनाया
अल्लाह आदमी बन आया
न मैं मंगी, न मैं परनी
झोली बाल झुलाया
उजर कित्ता वल दाने खावण दा
बेहेस्तों आप तड़ाया
अंत बहर दी
हाबिल काबिल पुत्त आदम दे
आदम किस दा जाया
अस्सां आदम खां नु अग्गे होया सूं
आदम साड्डा जाया
अंत बहर दी
इश्क़ न है रांद
जैसा खेलिन ग़बरू
जुस्से ए जान जी
भञजी जो हेकांद
ससी ने जे पांद
उछल तडे अध थिए
आन बाज़ीगर बाज़ी पतेड़ी
पुतला जोड़ बनाया
गली गली विच ढोल वजाउंदा
नाचू इश्क़ नचाया
अंत बहर दी
ऐन दा बुरक़ा मीम दी चादर
मुख पे घूंघट पाया
अली रज़ा है नाम हमारा
बुल्ल्या नाम दराया
अंत बहर दी
भावार्थ 
इक दिन गया मैं इश्क़ दे महकमे
(एक दिन मैं इश्क के महकमे (इदारे ) / कोर्ट में गया )
इश्क़ ने मेरी वड्डाई लुट ली
(इश्क ने मेरे मान सम्मान (अहम् ) को लूट लिया है। मेरे श्रेष्ठ होने का भाव समाप्त कर दिया। मेरी पहचान को समाप्त कर दिया है। Ishq has robbed my honor (aham). I ended up feeling superior. He (Ishq) has destroyed my identity. )
मैं तो गयो इश्क़ की दाद लेने
(मैं तो ईश्क की दाद /बड़ाई को इकठ्ठा करने गया था /लेने गया था I went to collect herpes / greatness of love)
 इश्क़ ने मेरी धानाई लुट ली
(ईश्क ने मेरे ही अस्तित्व को लूट लिया /समाप्त कर दिया Love robbed my existence)
इश्क़ पीर पैग़म्बरां नु लुट लहंदा
(ईश्क तो पीर और पैगंबरों को भी लूट लेता है Ishq also loots Pir and the prophets)
 वड्डे बादशाह दी बादशाही लुट ली
(बड़े बादशाह की बादशाही भी इसने लूट ली है It has also robbed the emperor of the great emperor.)
ए नादान बुल्ल्या, इश्क़ ने तेरा की लुट्टया?
(नादान (भोले ) बुल्ले शाह 'ईश्क' ने तुम्हारा क्या लूट लिया। इसका भाव है की तुम्हारा तो कुछ भी नहीं लूटा है।  Nadan (Bhole) Bulle Shah 'Ishq' robbed you ! It means that you have not looted anything.)
इश्क़ ने तो ख़ुदा की ख़ुदाई लुट ली
(ईश्क ने तो खुदा की खुदाई भी लूट ली है Ishq has even robbed God)
अंत बहर दी, कल न काईं
रंगी रंग बनाया, 
अंत बहर दी, कल न काईं
रंगी रंग बनाया, 
(आखिर में तुम्हारी महानता / सांसारिक महानता का कुछ नहीं बनना है/प्राप्त होना है जो कुछ भी तुमने बनाया है After all, your greatness / worldly greatness is not to be made / to be achieved whatever you have created)
अल्लाह आदमी बन आया
अल्लाह आदमी बन आया
अंत बहर दी, कल न काईं
रंगी रंग बनाया, 
(अल्लाह तो आदमी बन के आ गया है, अल्लाह/खुदा ने साधारण रूप बनाया है। Allah has come as a man, Allah / God has created a simple form)
न मैं मंगी, न मैं परनी
(ना तो मेरी मंगनी हुई है और ना ही मेरी शादी हुयी है। I am neither Engaged nor married)
झोली बल (मैं) झुलाया
(फिर भी मैंने, अपनी झोली में झुलाया है /शिशु को झुलाना-गोदी में रखना )
न मैं मंगी, न मैं परनी
झोली बल (मैं) झुलाया
उजर कित्ता वल दाने खावण दा
बेहेस्तों आप तड़ाया
(मैंने उस प्रदार्थ /अन्न को ग्रहण कर लिया है जिसके लिए मुझे मना किया गया था और मैंने खुद ही अपने आप को इस अवस्था में डाल दिया की मुझे वहाँ (ईडन ) से बाहर कर दिया गया। )
अंत बहर दी, कल न काईं
रंगी रंग बनाया, 
(तुमने जो भी प्राप्त किया है / जिसे अपना माना है वह आखिर में तुम्हारा नहीं रहना है और जो तुमने प्राप्त किया है उससे कुछ भी हासिल नहीं होगा।
हाबिल काबिल पुत्त आदम दे
आदम किस दा जाया?
( हाबिल और काबिल आदम की संतान हैं लेकिन आदम कहाँ से पैदा हुआ है। )
अस्सां आदम खां नु अग्गे होया सूं
आदम साड्डा जाया
अंत बहर दी, कल न काईं
रंगी रंग बनाया,
(मैं 'इश्क़' आदम के पैदा होने से भी पहले का हूँ और आदम की उत्पत्ति मुझसे ही हुई है )
इश्क़ न है रांद (खिलौना)
जैसा खेलिन ग़बरू
(इश्क कोई खेलने की वस्तु नहीं है जिससे कोई बच्चा खेले-भाव है की यह महत्पूर्ण है, कीमती है )
जुस्से ए जान जी
भञजी जो हेकांद
(यह सच्चा प्रेम है जिससे की 'चाह' 'लालसा' दूर भागती है )
सस्सी ने जे पांद
उछल तडे अध थिए
आन बाज़ीगर बाज़ी पतेड़ी
पुतला जोड़ बनाया
गली गली विच ढोल वजाउंदा
नाचू इश्क़ नचाया
अंत बहर दी...
ऐन दा बुरक़ा, मीम दी चादर
मुख पे घूंघट पाया
अली रज़ा है नाम हमारा
बुल्ल्या नाम दराया
अंत बहर दी, कल न काईं
रंगी रंग बनाया,
(जादूगर की तरह से उसने एक उक्ति लगाई। गली गली इश्क़ के मारे नाचता है। उसने गली गली ढोल बजाया और लोगों को कठपुतली की तरह बाजीगरी दिखाई। )

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