रविवार, 29 अगस्त 2021

माहि मैं तो देख्या दोई सन्यासी राम .../ तुलसीदास / गायन : स्वर्गीय दापू खान

 https://youtu.be/b-4ivJspRWQ 

जैसलमेर के सोनार किले के अंदर म्यूजियम के आगे रंगीन पगड़ी में बैठे बुजुर्ग दपु खान कमायचा बजाते, लोकगीत सुनाते। देसी-विदेशी पर्यटक उनको खड़े होकर एकटक निहारते रहते। टेवटा, कुर्ता और रंगीन साफा पहने दपु खान को देखकर लगता कि उनकी उम्र एक पड़ाव पर आकर ठहर सी गयी हो। गीत शुरू करने से पहले वे अंग्रेजी में पर्यटकों को अपनी इस कला से रूबरू करवाते थे और लोग उनके अंग्रेजी बोलने का तरीका देखकर गद्गद् हो जाते थे। 
दापू खान पिछले 30 वर्षों से जैसलमेर में Khamaicha बजा रहे थे। उन्होंने राग पहाड़ी, राणा और मल्हार में स्व-संगीतबद्ध गीत प्रस्तुत किए हैं। जब इन्होने बजाना शुरू किया था, तब इनके आसपास के लोग इन्हें सुनने के लिए इकठ्ठा हो जाते थे। तब से उन्हें जीवन में इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए यह मकसद बना लिया और पूर्वजों की इस महान कला का प्रचार प्रसार करने लगे।
दापू खान को 2018 से पहले नाम से बहुत ही कम लोग जानते थे, जबकि दुनियाभर में लोग उनके चेहरे से परिचित थे। उनका लगभग पूरा जीवन सोनार किले के चबूतरे पर बैठकर कमायचा बजाते हुए बिताया। किला देखने आये पर्यटक उनके गीत सुनते, रिकार्ड करते और उनकी तस्वीरें लेते। 2018 में दृश्यम फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा निर्मित मूमल गीत से वे बेहद लोकप्रिय हुए थे, जिसके बाद लोग उनको नाम व चेहरे से जानने लगे।
जैसलमेर के अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त लोक कलाकार दापू खान मिरासी का 13 अग
स्त 2021 को निधन हो गया।
 
आगे आगे राम जी चलत 
पीछे लछिमण  भाई रे
माहि मैं तो देख्या दो सन्यासी राम 
माहि रे मैं देख्या दो अविनाशी रे 
डावे भुजा धनुष उठावे 
जिवने मा बाण चलावे रे 
माहि रे मैं देख्या दो अविनाशी रे 
रे माहि मैं तो देख्या दो सन्यासी राम
कहे रे राजा रा कँवर कहिजे 
कहे तो नगरी रा वासी रे
माहि मैं तो देख्या दोई सन्यासी राम  
माहि रे मैं देख्या दो अविनाशी रे 
राजा रे दशरथ रा कँवर कहिजे 
अयोध्या नगरी रा वासी रे 
माहि मैं तो देख्या दोई सन्यासी 
पेरण पीताम्बर लाल लँगोटो 
वन मा फिरे उदासी रे 
माहि मैं तो देख्या दोई सन्यासी  
माहि मैं देख्या दो अविनाशी रे 
माता रे पिता जी हमें दीनों बहुत चोटो 
वन मा फिरे पड्या उदासी रे 
माहि मैं तो देख्या दोई सन्यासी 
माहि मैं तो देख्या दोई वनवासी 
बोलिया तुलसीदास आसा रघुवर की 
राम जी मिलण कद होसी रे 
माहि रे मैं तो देख्या दोई सन्यासी राम 

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