शनिवार, 9 मार्च 2019

सखि लखन चलो, नृप कुँवर भलो : अवधी विवाह गीत

https://youtu.be/dL4WNMJbkn4

सखि लखन चलो, नृप कुँवर भलो : अवधी विवाह गीत 
स्वर : संगीता सिंह 

मूल कविता : रीवां नरेश महाराज रघुराज सिंह (१८३१-१८८०) 
ग्रन्थ  : 'राम-स्वयंवर'

सुश्री संगीता सिंह द्वारा गाए गए इस अत्यंत सरस गीत के बोल और भाव 
बहुत आकर्षक हैं। इसकी मूल कविता महाराज रघुराज सिंह द्वारा रचित 
ग्रन्थ 'राम -स्वयंवर ' में संकलित है। यद्यपि कालक्रम में गायकों ने अपनी 
समझ के अनुसार बोल में परिवर्तन कर लिए हैं तथापि गीत के मूल भाव 
अब भी वही हैं। 

 मूल कविता :
सखि लखन चलो नृप कुँवर भलो।
मिथिला पति सदन सिया बनरो।
सिरमौर बसन तन में पियरो।
हठहेरि हरत हमरो हियरो।  
उर सोहत मोतिन को गजरो
रतनारी ऍंखियन में कजरो।
चितये चित चोरत सखि समरो
चितये बिन जिय न जिये हमरो।
अलकैं अलि अजब लसैं चेहरो।
झपि झूलि रह्यो कटि लौं सेहरो।
चित चहत अरी लगि जाउँ गरे।
रघुराज त्यागि जग को झगरो।

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