शुक्रवार, 1 मार्च 2024

जय सगुण निर्गुण रूप.../ श्री गोस्वामी तुलसी दास कृत / स्वर : माधवी मधुकर

 https://youtu.be/aeIqlKJr3PQ 

जय सगुण निर्गुण रूप अनूप भूप सिरोमने।
दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने।।
अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुण दुख दहे।
जय प्रनत पाल दयाल प्रभु संयुक्त सक्ति नमामहे।।
१॥

तब बिषम माया बस सुरासुर नाग नर आग जग हरे।
भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निशी काल कर्म गुनानी भरे।।
जे नाथ करि करुणा बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे।
भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे।।२

जे ज्ञान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।
ते पाई सुर दुर्लभ पदादपि परत देखत हरी।।
बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।
जपि नाम तब बिनु श्रम तरहीं भव नाथ सो समरामहे।।३

जे चरण सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपत्नी तरी।
नख निर्गता मुनि बंदिता त्रैलोक पावनि सुरसरि।।
ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।
पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेश नित्य भजामहे।।४

अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।
षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने।।
फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।
पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे।।५

जे ब्रम्ह अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।
ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं।।
करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं।
मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।।६

दोहा
सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।
अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार॥
बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर।
बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर॥

भावार्थ
सगुण और निर्गुण रूप! हे अनुपम रूप-लावण्ययुक्त!
हे राजाओं के शिरोमणि! आपकी जय हो।
आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरों
को अपनी भुजाओं के बल से मार डाला।
आपने मनुष्य अवतार लेकर संसार के भार को नष्ट
करके अत्यंत कठोर दुःखों को भस्म कर दिया।
हे दयालु! हे शरणागत की रक्षा करने वाले प्रभो!
आपकी जय हो। मैं शक्ति (सीता जी) सहित शक्तिमान
आपको नमस्कार करता हूँ॥१॥

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